सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः
Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament
महाचमूकक्षदवाभिपन्नं महाहवे भीष्ममयाग्निदाहम् । ये सेहुरात्तायुधती&णवेगं ते राजपुत्रा निहता: प्रमादात्,“महासमरमें भीष्मरूपी अग्नि जब पाण्डव-सेनाको जला रही थी, उस समय ऊँची ध्वजाओंके शिखरपर फहराती हुई पताका ही धूमके समान जान पड़ती थी, बाण-वर्षा ही आगकी लपछें थीं, क्रोध ही प्रचण्ड वायु बनकर उस ज्वालाको बढ़ा रहा था, विशाल धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और रथके पहियोंका शब्द ही मानो उस अग्निदाहसे उठनेवाली चट-चट ध्वनि था, कवच और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उस आगकी आहुति बन रहे थे, विशाल सेनारूपी सूखे जंगलमें दावानलके समान वह आग लगी थी, हाथमें लिये हुए अस्त्र-शस्त्र ही उस अग्निके प्रचण्ड वेग थे, ऐसे अग्निदाहके कष्टको जिन्होंने सह लिया, वे ही राजपुत्र प्रमादवश मारे गये
mahācamūkṣadavābhipannaṁ mahāhave bhīṣmamayāgnidāham | ye sehurāttāyudhatīvravegaṁ te rājaputrā nihatāḥ pramādāt ||
Sūta berkata: Dalam pertempuran besar itu, ketika bala tentera yang luas disergap oleh kebakaran seperti api rimba—Bhīṣma sendiri menjadi api itu—para putera raja yang pernah menahan gelombang serangan senjata yang ganas dalam serbuan membara itu, akhirnya dibunuh juga kerana kelalaian.
सूत उवाच