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Shloka 26

भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation

#स्ज्िम (2) अअसना २. यद्यपि शास्त्रविधिके त्यागकी बात गीताके सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भी कही जा चुकी थी और यहाँ भी कहते हैं; पर इन दोनोंके भावमें बड़ा अन्तर है। वहाँ अवहेलनापूर्वक किये जानेवाले शास्त्रविधिके त्यागका वर्णन है और यहाँ न जाननेके कारण होनेवाले शास्त्रविधिके त्यागका है। उनको तो शास्त्रकी परवा ही नहीं है; अतः वे मनमाने ढंगसे जिस कर्मको अच्छा समझते हैं, उसे करते हैं। इसीलिये वहाँ *वर्तते कामकारत:” कहा गया है; परंतु यहाँ “यजन्ते श्रद्धयान्विता: कहा है, अतः इन लोगोंमें श्रद्धा है, जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ अवहेलना नहीं हो सकती। इन लोगोंको परिस्थिति और वातावरणकी प्रतिकूलतासे, अवकाशके अभावसे अथवा परिश्रम तथा अध्ययन आदिकी कमीसे शास्त्रविधिका ज्ञान नहीं होता और इस अज्ञताके कारण ही इनके द्वारा उसका त्याग होता है। $. जो शास्त्रको न जाननेके कारण शास्त्रविधिका त्याग करके श्रद्धांके साथ पूजन आदि करनेवाले हैं, वे कैसे स्वभाववाले हैं--दैव स्वभाववाले या आसुरस्वभाववाले? इसका स्पष्टीकरण पहले नहीं हुआ। अतः उसीको समझनेके लिये अर्जुनका यह प्रश्न है कि ऐसे लोगोंकी स्थिति सात्त्विकी है अथवा राजसी या तामसी? अर्थात्‌ वे दैवीसम्पदावाले हैं या आसुरीसम्पदावाले? ऊपरके विवेचनसे यह पता लगता है कि संसारमें निम्नलिखित पाँच प्रकारके मनुष्य हो सकते हैं-- (१) जिनमें श्रद्धा भी है और जो शास्त्रविधिका पालन भी करते हैं, ऐसे पुरुष दो प्रकारके हैं--एक तो निष्कामभावसे कर्मोका आचरण करनेवाले और दूसरे सकामभावसे कर्मोंका आचरण करनेवाले। निष्कामभावसे आचरण करनेवाले दैवीसम्पदायुक्त सात्त्विक पुरुष मोक्षको प्राप्त होते हैं; इनका वर्णन प्रधानतया गीताके सोलहवें अध्यायके पहले तीन श्लोकोंमें तथा इस अध्यायके ग्यारहवें, चौदहवेंसे सत्रहवें और बीसवें श्लोकोंमें है। सकामभावसे आचरण करनेवाले सत्त्वमिश्रित राजस पुरुष सिद्धि, सुख तथा स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होते हैं; इनका वर्णन गीताके दूसरे अध्यायके बयालीसवें, तैंतालीसवें और चौवालीसवेंमें, चौथे अध्यायके बारहवेंमें, सातवेंके बीसवें, इक्कीसवें और बाईसवेंमें और नवें अध्यायके बीसवें, इक्कीसवें और तेईसवें तथा इस अध्यायके बारहवें, अठारहवें और इक्कीसवें श्लोकोंमें है। (२) जो लोग शास्त्रविधिका किसी अंशमें पालन करते हुए यज्ञ, दान, तप आदि कर्म तो करते हैं, परंतु जिनमें श्रद्धा नहीं होती, उन पुरुषोंके कर्म असत्‌ (निष्फल) होते हैं; उन्हें इस लोक और परलोकमें उन कर्मोसे कोई भी लाभ नहीं होता। इनका वर्णन गीताके इस अध्यायके अट्ठबराईसवें श्लोकमें किया गया है। (३) जो लोग अज्ञताके कारण शास्त्रविधिका तो त्याग करते हैं, परंतु जिनमें श्रद्धा है, ऐसे पुरुष श्रद्धाके भेदसे सात््विक भी होते हैं और राजस तथा तामस भी। इनकी गति भी इनके स्वरूपके अनुसार ही होती है। इनका वर्णन इस अध्यायके दूसरे, तीसरे तथा चौथे श्लोकोंमें किया गया है। (४) जो लोग न तो शास्त्रको मानते हैं और न जिनमें श्रद्धा ही है; इससे जो काम, क्रोध और लोभके वश होकर अपना पापमय जीवन बिताते हैं, वे आसुरी-सम्पदावाले लोग नरकोंमें गिरते हैं तथा नीच योनियोंको प्राप्त होते हैं। उनका वर्णन गीताके सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें, नवेंके बारहवेंमें, सोलहतवें अध्यायके सातवेंसे लेकर बीसवेंतकमें और इस अध्यायके पाँचवें, छठे एवं तेरहवें श्लोकोंमें है। (५) जो लोग अवहेलनासे शास्त्रविधिका त्याग करते हैं और अपनी समझसे उन्हें जो अच्छा लगता है, वही करते हैं, उन यथेच्छाचारी पुरुषोंमें जिनके कर्म शास्त्रनिषिद्ध होते हैं, उन तामस पुरुषोंको तो नरकादि दुर्गतिकी प्राप्ति होती है और जिनके कर्म अच्छे होते हैं, उन पुरुषोंको शास्त्रविधिका त्याग कर देनेके कारण कोई भी फल नहीं मिलता। इसका वर्णन गीताके सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें किया गया है। ध्यान रहे कि इनके द्वारा जो पापकर्म किये जाते हैं, उनका फल-तिर्यक्‌-योनियोंकी प्राप्ति और नरकोंकी प्राप्ति--अवश्य होता है। इन पाँच प्रकारके मनुष्योंके वर्णनमें प्रमाणस्वरूप जिन श्लोकोंका संकेत किया गया है, उनके अतिरिक्त अन्यान्य श्लोकोंमें भी इनका वर्णन है; परंतु यहाँ उन सबका उल्लेख करनेसे बहुत विस्तार हो जाता, इसलिये नहीं किया गया। २. जो श्रद्धा शास्त्रके श्रवण-पठनादिसे होती है, उसे “शास्त्रजा' कहते हैं और जो पूर्वजन्मोंके तथा इस जन्मके कर्मोंके संस्कारानुसार स्वाभाविक होती है, वह 'स्वभावजा' कहलाती है। 3. पुरुषका वास्तविक स्वरूप तो गुणातीत ही है; परंतु यहाँ उस पुरुषकी बात है, जो प्रकृतिमें स्थित है और प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंसे सम्बद्ध है; क्योंकि गुणजन्य भेद “प्रकृतिस्थ पुरुष' में ही सम्भव है। जो गुणोंसे परे है, उसमें तो गुणोंके भेदकी कल्पना ही नहीं हो सकती। यहाँ भगवान्‌ यह बतलाते हैं कि जिसकी अन्तःकरणके अनुरूप जैसी सात्तविकी, राजसी या तामसी श्रद्धा होती है--वैसी ही उस पुरुषकी निष्ठा या स्थिति होती है अर्थात्‌ जिसकी जैसी श्रद्धा है, वही उसका स्वरूप है। इससे भगवानने श्रद्धा, निष्ठा और स्वरूपकी एकता करते हुए “उनकी कौन-सी निष्ठा है” अर्जुनके इस प्रश्नका उत्तर दिया है। ३. अभिप्राय यह है कि देवताओंको पूजनेवाले मनुष्य सात्विक हैं--सात्त्विकी निष्ठावाले हैं। देवताओंसे यहाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, इन्द्र, वरुण, यम, अश्विनीकुमार और विश्वेदेव आदि शास्त्रोक्त देव समझने चाहिये। यहाँ देवपूजनरूप क्रिया सात््विक होनेके कारण उसे करनेवालोंको सात्त्विक बतलाया है; परंतु पूर्ण सात्त्विक तो वही है, जो सात्त्विक क्रियाको निष्कामभावसे करता है। २. यक्षसे कुबेरादि और राक्षसोंसे राहु-केतु आदि समझना चाहिये। 3. मरनेके बाद जो पापकर्मवश भूत-प्रेतादिके वायुप्रधान देहको प्राप्त होते हैं, वे भूत-प्रेत कहलाते हैं। ४. जिसमें नाना प्रकारके आडम्बरोंसे शरीर और इन्द्रियोंको कष्ट पहुँचाया जाता है और जिसका स्वरूप बड़ा भयानक होता है, इस प्रकारके शास्त्रविरुद्ध भयानक तप करनेवाले मनुष्योंमें श्रद्धा नहीं होती। वे लोगोंको ठगनेके लिये और उनपर रोब जमानेके लिये पाखण्ड रचते हैं तथा सदा अहंकारसे फूले रहते हैं। इसीसे उन्हें दम्भ और अहंकारसे युक्त कहा गया है। ५. पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, दस इन्द्रियाँ और पाँच इन्द्रियोंक विषय--इन तेईस तत्त्वोंके समूहका नाम “भूतग्राम” है। ६. शरीरको क्षीण और दुर्बल करना तथा स्वयं अपने आत्माको या किसीके भी आत्माको दुःख पहुँचाना भूतसमुदायको और परमात्माको कृश करना है; क्योंकि सबके हृदयमें आत्मरूपसे परमात्मा ही स्थित हैं। ७. मनुष्य जैसा आहार करता है, वैसा ही उसका अन्तःकरण बनता है और अन्त:करणके अनुरूप ही श्रद्धा भी होती है। आहार शुद्ध होगा तो उसके परिणामस्वरूप अन्त:करण भी शुद्ध होगा--'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि:” (छान्दोग्य० ७,मुक्तसड्रो5नहंवादीः ५ धृत्युत्ताहसमन्वित: । सिद्धयसिद्धयोर्निरविकार: कर्ता सात््विक उच्यते जो कर्ता संगरहित, अहंकारके वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा कार्यके सिद्ध होने और न होनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंसे रहित है, वह सात््विक कहा जाता हैः

arjuna uvāca | kṛtārthabuddhir asmiha yac chrutaṁ tvatprasādataḥ | sthito 'smi gatasaṁdehaḥ kariṣye vacanaṁ tava ||

Arjuna berkata: “Dengan rahmatmu, daripada apa yang telah aku dengar di sini, aku memperoleh kejernihan tujuan. Keraguanku lenyap; aku berdiri teguh. Aku akan bertindak menurut kata-katamu.”

मुक्तसङ्गःfree from attachment
मुक्तसङ्गः:
Karta
TypeAdjective
Rootमुक्तसङ्ग
FormMasculine, Nominative, Singular
अनहंवादीnot speaking in egoistic terms (not saying 'I')
अनहंवादी:
Karta
TypeAdjective
Rootअनहंवादिन्
FormMasculine, Nominative, Singular
धृतिउत्साहसमन्वितःendowed with steadiness and enthusiasm
धृतिउत्साहसमन्वितः:
Karta
TypeAdjective
Rootधृत्युत्साहसमन्वित
FormMasculine, Nominative, Singular
सिद्धिअसिद्ध्योःin success and failure
सिद्धिअसिद्ध्योः:
Adhikarana
TypeNoun
Rootसिद्ध्यसिद्धि
FormFeminine, Locative, Dual
निरविकारःunchanged; free from (emotional) modification
निरविकारः:
Karta
TypeAdjective
Rootनिरविकार
FormMasculine, Nominative, Singular
कर्ताdoer/agent
कर्ता:
Karta
TypeNoun
Rootकर्तृ
FormMasculine, Nominative, Singular
सात्त्विकःsattvic (of the quality of sattva)
सात्त्विकः:
Karta
TypeAdjective
Rootसात्त्विक
FormMasculine, Nominative, Singular
उच्यतेis said/called
उच्यते:
TypeVerb
Rootवच्
FormPresent, Indicative, Passive, Third, Singular

अजुन उवाच

A
Arjuna
K
Krishna