Mahabharata Adhyaya 36
Bhishma ParvaAdhyaya 367 Versesरण-स्थिति पृष्ठभूमि में स्थिर; अध्याय का केन्द्र युद्ध नहीं, अर्जुन-श्रीकृष्ण संवाद द्वारा आध्यात्मिक दृष्टि का विस्तार है।

Adhyaya 36

Guṇa-traya-vibhāga-yoga (त्रिगुणविभागयोग) — The Analysis of the Three Guṇas

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Embedded Discourse within Bhīṣma-parva)

Kṛṣṇa announces a superior knowledge leading to liberation and likeness to the divine standpoint (1–2). He frames cosmogenesis through prakṛti: the ‘great brahman’ as womb and himself as the seed-giving father, situating embodied beings within a causal matrix (3–4). He then defines the three guṇas—sattva (clarity), rajas (passion), tamas (inertia)—as binding forces for the imperishable embodied self within the body (5). Each guṇa is characterized by its binding mechanism: sattva by attachment to happiness and knowledge (6), rajas by craving and attachment to action (7), tamas by delusion expressed as negligence, laziness, and sleep (8). Their functional outcomes are mapped: sattva inclines to happiness, rajas to activity, tamas to heedlessness via obscuring knowledge (9–13). Post-mortem trajectories and fruits are described according to dominant guṇa at death and the moral-epistemic results of action (14–18). The chapter culminates in discernment: seeing no agent beyond guṇas and knowing the transcendent beyond them leads to ‘my state’ (19), and transcending the guṇas yields freedom from birth-death-aging-sorrow (20). Arjuna asks for the marks and conduct of one beyond guṇas (21). Kṛṣṇa answers: equanimity toward illumination/activity/delusion, unaffected witnessing, sameness in pleasure-pain and social valuation, and renunciation of compulsive undertakings (22–25). Steady bhakti is given as the practical means to surpass the guṇas and attain brahma-bhāva; Kṛṣṇa identifies himself as the foundation of brahman, the imperishable, and enduring dharma and ultimate happiness (26–27).

Chapter Arc: रणभूमि के बीच, अर्जुन ‘भगवन्’ कहकर श्रीकृष्ण की सत्ता का अर्थ खोलता है—जो उत्पत्ति-प्रलय, भूतों के आगमन-निर्गमन, विद्या-अविद्या को जानता है, वही ‘भगवान्’ कहलाता है। → अर्जुन की जिज्ञासा तीव्र होती है: यदि समस्त जगत् में ईश्वर की विभूतियाँ फैली हैं, तो उन्हें कैसे पहचाना जाए? श्रीकृष्ण प्रेम से (‘प्रीयमाणाय’) संकेत करते हैं कि अर्जुन का अनुराग ही इस ज्ञान का पात्र है, और वे देवताओं, मनुओं, सप्तर्षियों, इन्द्र आदि को अपनी ही विभूतियाँ बताकर दृष्टि को व्यापक करते हैं। → विभूतियों का विराट-मानचित्र खुलता है—देव, ऋषि, अधिपति, कल्याणस्वरूप शम्भु (शंकर) तक को श्रीकृष्ण अपने ही स्वरूप/प्रभा के रूप में रखते हैं; सृष्टि-प्रवृत्ति के आदितप और सनकादि ऋषियों की उत्पत्ति जैसे प्रसंगों से यह स्थापित होता है कि जगत् की श्रेष्ठता जहाँ-जहाँ दिखे, वहाँ- वहाँ उसी एक परम सत्ता की झलक है। → अध्याय का निष्कर्ष यह बनता है कि अर्जुन को युद्ध-धर्म के बीच भी ईश्वर-दर्शन का व्यावहारिक उपाय मिल गया—श्रेष्ठ, तेजस्वी, कल्याणकारी, अधिष्ठाता रूपों में परमात्मा की पहचान; और यह कि यह वर्णन अनन्त का केवल संकेत-मात्र है। → अर्जुन के भीतर ‘और देखना’ की उत्कंठा जागती है—विभूतियों के संकेत अब विराट-रूप के प्रत्यक्ष दर्शन की ओर मन को धकेलते हैं।

Shlokas

Verse 1

७८) “उत्पत्ति और प्रलयको

Arjuna berkata: “Wahai Tuhan, sebagai seorang yang mencari penyatuan dengan Yang Ilahi, bagaimanakah aku harus sentiasa merenungkan-Mu? Wahai Bhagavan, dalam bentuk-bentuk, sifat-sifat, dan ranah pengalaman yang manakah aku patut bermeditasi kepada-Mu?”

Verse 3

४६) “सभी देवता, समस्त मनु, सप्तर्षि तथा जो मनुके पुत्र हैं और जो ये देवताओंके अधिपति इन्द्र हैं--ये सभी भगवान्‌ विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं।' ५. “गुडाका' निद्राको कहते हैं। उसके स्वामीको “गुडाकेश” कहते हैं। भगवान्‌ अर्जुनको “गुडाकेश' नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाते हैं कि तुम निद्रापर विजय प्राप्त कर चुके हो; अतएव मेरे उपदेशको धारण करके अज्ञाननिद्राको भी जीत सकते हो। ३. समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित जो “चेतन” है, जिसको परा “प्रकृति” और “क्षेत्रज्ञ' भी कहते हैं (गीता ७।५; १३।१), उसीको यहाँ “सब भूतोंके हृदयमें स्थित सबका आत्मा" बतलाया है। वह भगवान्‌का ही अंश होनेके कारण (गीता १५।७) वस्तुतः भगवत्स्वरूप ही है (गीता १३।२)। इसीलिये भगवानने कहा है कि “वह आत्मा मैं हूँ।' २. यहाँ “भूत” शब्दसे चराचर समस्त देहधारी प्राणी समझने चाहिये। ये सब प्राणी भगवानसे ही उत्पन्न होते हैं, उन्हींमें स्थित हैं और प्रलयकालमें भी उन्हींमें लीन होते हैं; भगवान्‌ ही सबके मूल कारण और आधार हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उन सबका आदि, मध्य और अन्त बतलाया | 3. अदितिके धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वानू पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु नामक बारह पुत्रोंको द्वादश आदित्य कहते हैं-- धाता मित्रोडर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान्‌ पूषा च सविता दशमस्तथा ।। एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते | जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिक: ।। (महा०, आदि० ६५।१५-१६) इनमें जो विष्णु हैं, वे इन सबके राजा हैं और अन्य सबसे श्रेष्ठ हैं। इसीलिये भगवानने विष्णुकी अपना स्वरूप बतलाया है। ४. सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं, उन सबमें सूर्य प्रधान हैं; इसलिये भगवानने समस्त ज्योतियोंमें सूर्यकोी अपना स्वरूप बतलाया है। ५. उनचास मसरुतोंके नाम ये हैं--“सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यग्ज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्‌, हरित, ऋतजित्‌, सत्यजित्‌, सुषेण, सेनजित्‌, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्‌, अन्यादृक्‌, यादृक्‌, प्रतिकृतू, ऋक्‌, समिति, संरम्भ, ईदृक्ष, पुरुष, अन्यादृक्ष, चेतस, समिता, समिदृक्ष, प्रतिदृक्ष, मरुति, सरत, देव, दिश, यजु:, अनुदृक्‌, साम, मानुष और विश्‌ (वायुपुराण ६७।१२३ से १३०)। गरुडपुराण तथा अन्यान्य पुराणोंमें कुछ नामभेद पाये जाते हैं; परंतु मरीचि” नाम कहीं भी नहीं मिला है। इसीलिये “मरीचि” को मरुत्‌ न मानकर समस्त मरुद्गणोंका तेज या किरणें माना गया है।' दक्षकन्या मरुत्वतीसे उत्पन्न पुत्रोंकी भी मरुदगण कहते हैं (हरिवंश)। भिन्न-भिन्न मन्वन्तरोंमें भिन्न- भिन्न नामोंसे तथा विभिन्न प्रकारसे इनकी उत्पत्तिके वर्णन पुराणोंमें मिलते हैं। दितिपुत्र उनचास मरुद्गण दिति देवीके भगवद्ध्यानरूप व्रतके तेजसे उत्पन्न हैं। उस तेजके ही कारण इनका गर्भमें विनाश नहीं हो सका था। इसलिये उनके इस तेजको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. अश्विनी, भरणी और कृतिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबके स्वामी और सम्पूर्ण तारा- मण्डलके राजा होनेसे चन्द्रमा भगवान्‌की प्रधान विभूति हैं। इसलिये यहाँ उनको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ७. ऋक्‌, यजु, साम और अथर्व--इन चारों वेदोंमें सामवेद अत्यन्त मधुर संगीतमय तथा परमेश्वरकी अत्यन्त रमणीय स्तुतियोंसे युक्त है; अतः वेदोंमें उसकी प्रधानता है। इसलिये भगवानने उसको अपना स्वरूप बतलाया है। ८. समस्त प्राणियोंकी जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा उनको दुःख-सुखका और समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है, जो अन्त:करणकी वृत्तिविशेष है, गीताके तेरहवें अध्यायके छठे श्लोकमें जिसकी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है, उस ज्ञान-शक्तिका नाम “चेतना” है। यह प्राणियोंके समस्त अनुभवोंकी हेतुभूता प्रधान शक्ति है, इसलिये इसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३. हर, बहुरूप, >यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली--ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं-- हरश्न बहुरूपश्च त्रयम्बकश्नापराजित: । वृषाकपिश्च शम्भुश्न कपर्दी रैवतस्तथा ।। मृगव्याधश्न शर्वश्ष कपाली च विशाम्पते । एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवने श्वरा: ।। (हरिवंश० १

Arjuna berkata: (Dia memulakan jawapannya terhadap pendedahan Kṛṣṇa tentang “vibhūti” — manifestasi-manifestasi ketuhanan — dengan memohon kejelasan dan pengesahan tentang kehadiran Tuhan yang meliputi segalanya, serta bagaimana Hakikat Yang Satu tampak sebagai pelbagai kuasa di dunia. Dalam latar etika medan perang, ucapan Arjuna menandai peralihan daripada kekeliruan kepada pertanyaan yang penuh takzim—ingin memahami bagaimana mengenali Yang Ilahi di tengah kewajipan, pertentangan, dan kepelbagaian makhluk.)

Verse 5

५) “मैंने विविध प्रकारके लोकोंको उत्पन्न करनेकी इच्छासे जो सबसे पहले तप किया

Dia berkata: “Ketika aku mula-mula menjalani tapa dengan hasrat melahirkan pelbagai jenis alam, daripada tapa yang tidak terputus itu Tuhan sendiri menzahirkan diri sebagai empat rupa yang membawa nama ‘San’—Sanaka, Sanandana, Sanātana, dan Sanatkumāra. Dalam satu kitaran kosmik yang terdahulu, pada saat pralaya, ajaran tentang pengetahuan Diri telah lenyap dari dunia ini; para resi itu mengajarkannya kembali dengan sempurna, dan melalui ajaran tersebut para pelihat menyedari kebenaran Diri di dalam hati mereka sendiri.”

Verse 7

#फमा न () असडजतन- ६. 'प्रीयमाणाय” विशेषणका प्रयोग करके भगवानने यह दिखलाया है कि हे अर्जुन! तुम्हारा मुझमें अतिशय प्रेम है

Arjuna berkata: (Ini ialah penanda penutur yang memperkenalkan jawapan Arjuna dalam dialog.) Dalam latar etika dan naratif Bhīṣma Parva—di ambang peperangan—kata-kata Arjuna menandakan peralihan daripada sekadar mendengar kepada bertanya dan merenung secara moral, ketika dia menanggapi ajaran Kṛṣṇa untuk meleraikan keraguan tentang kewajipan, tindakan yang benar, dan jalan menuju keteguhan batin di tengah pertentangan.

Verse 10

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌गीतोपनिषद्‌, श्रीकृष्णाजुनसंवादमें विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Mahabharata bahagian Bhishma Parva—khususnya dalam seksyen yang dikenali sebagai Bhagavad Gita Parva—ajaran Upanishad yang bernama Bhagavad Gita, yakni pengetahuan Brahman dan disiplin yoga, berakhir di sini: bab kesepuluh, bertajuk “Vibhuti Yoga”, dalam dialog antara Sri Krishna dan Arjuna, telah selesai.

Verse 11

५१, ५२) इनमें शम्भु अर्थात्‌ शंकर सबके अधीश्वर (राजा) हैं तथा कल्याणप्रदाता और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये उन्हें भगवान्‌ने अपना स्वरूप कहा है। २. धर, ध्रुव, सोम, अह:, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास--इन आठोंको वसु कहते हैं-- धरो ध्रुवश्च सोमश्न अहश्वैवानिलोडनल: । प्रत्यूषश्न प्रभासश्न॒ वसवोषूष्टौ प्रकीर्तिता: ।। (महा०, आदि० ६६।१८) इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा हैं और देवताओंको हवि पहुँचानेवाले हैं। इसके अतिरिक्त वे भगवानके मुख भी माने जाते हैं। इसीलिये अग्नि (पावक)-को भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। 3. समस्त नक्षत्र सुमेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और सुमेरु पर्वत नक्षत्र और द्वीपोंका केन्द्र तथा सुवर्ण और रत्नोंका भण्डार माना जाता है तथा उसके शिखर अन्य पर्वतोंकी अपेक्षा ऊँचे हैं। इस प्रकार शिखरवाले पर्वतोंमें प्रधान होनेसे सुमेरको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ४. बृहस्पति देवराज इन्द्रके गुरु, देवताओंके कुलपुरोहित और विद्या-बुद्धिमें सर्वश्रेष्ठ हैं तथा संसारके समस्त पुरोहितोंमें मुख्य और अंगिरसोंके राजा माने गये हैं। इसलिये भगवान्‌ने उनको अपना स्वरूप कहा है। ५. स्कन्दका दूसरा नाम कार्तिकेय है। इनके छः: मुख और बारह हाथ हैं। ये महादेवजीके पुत्र और देवताओंके सेनापति हैं। कहीं-कहीं इन्हें अग्निके तेजसे तथा दक्षकन्या स्वाहाके द्वारा उत्पन्न माना गया है (महाभारत, वनपर्व २२३)। इनके सम्बन्धमें महाभारत और पुराणोंमें बड़ी ही विचित्र-विचित्र कथाएँ मिलती हैं। संसारके समस्त सेनापतियोंमें ये प्रधान हैं, इसीलिये भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ६. महर्षि बहुत-से हैं, उनके लक्षण और उनमेंसे प्रधान दसके नाम ये हैं-- ईश्वरा: स्वयमुद्धूता मानसा ब्रह्मण: सुता: । यस्मान्न हन्यते मानैर्महान्‌ परिगत: पुर: ।। यस्मादृषन्ति ये धीरा महान्तं सर्वतो गुणै: । तस्मान्महर्षय: प्रोक्ता बुद्धेः परमदर्शिन: ।। भृगुर्मरीचिरत्रिश्व अंगिरा: पुलह: क्रतुः । मनुर्दक्षो वसिष्ठश्न॒ पुलस्त्यश्वेति ते दश ।। ब्रह्मणो मानसा होत उद्धूता: स्वयमी श्वरा: । प्रवर्तत ऋषेर्यस्मान्महांस्तस्मान्महर्षय: ।। (वायुपुराण ५९।८२-८३, ८९-९०) “ब्रह्माके ये मानस पुत्र ऐश्वर्यवान्‌ (सिद्धियोंसे सम्पन्न) एवं स्वयं उत्पन्न हैं। परिमाणसे जिसका हनन न हो (अर्थात्‌ जो अपरिमेय हो) और जो सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सामने (प्रत्यक्ष) हो, वही महान्‌ है। जो बुद्धिके पार पहुँचे हुए (भगवत्प्राप्त) विज्ञजन गुणोंके द्वारा उस महान्‌ (परमेश्वर)-का सब ओरसे अवलम्बन करते हैं, वे इसी कारण (“महान्तम्‌ ऋषन्ति इति महर्षय:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार) महर्षि कहलाते हैं। भूगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य--ये दस महर्षि हैं। ये सब ब्रह्माके मनसे स्वयं उत्पन्न हुए हैं और ऐश्वर्यवान्‌ हैं। चूँकि ऋषि (ब्रह्माजी)-से इन ऋषियोंके रूपमें स्वयं महान्‌ (परमेश्वर) ही प्रकट हुए, इसलिये ये महर्षि कहलाये।” महर्षियोंमें भूगुजी मुख्य हैं। ये भगवानके भक्त, ज्ञानी और बड़े तेजस्वी हैं; इसीलिये इनको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। $. किसी अर्थका बोध करानेवाले शब्दको 'गी:” (वाणी) कहते हैं और ओंकार (प्रणव)-को “एक अक्षर कहते हैं (गीता ८।१३)। जितने भी अर्थबोधक शब्द हैं, उन सबमें प्रणवकी प्रधानता है; क्योंकि “प्रणव" भगवानका नाम है (गीता १७।२३)। प्रणवके जपसे भगवानकी प्राप्ति होती है। नाम और नामीमें अभेद माना गया है। इसलिये भगवानने “प्रणव” को अपना स्वरूप बतलाया है। २. जपयज्ञमें हिंसाका सर्वधा अभाव है और जपयज्ञ भगवानका प्रत्यक्ष करानेवाला है। मनुस्मृतिमें भी जपयज्ञकी बहुत प्रशंसा की गयी है-- विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिग्गुणै: | उपांशु: स्पाच्छतगुण: साहस्रो मानस: स्मृत: ।। (२।८५) “विधियज्ञसे जपयज्ञ दसगुना, उपांशुजप सौगुना और मानसजप हजारगुना श्रेष्ठ कहा गया है।' इसलिये समस्त यज्ञोंमें जपयज्ञकी प्रधानता है, यह भाव दिखलानेके लिये भगवानने जपयज्ञको अपना स्वरूप बतलाया है। ३. स्थिर रहनेवालोंको स्थावर कहते हैं। जितने भी पहाड़ हैं, सब अचल होनेके कारण स्थावर हैं। उनमें हिमालय सर्वोत्तम है। वह परम पवित्र तपोभूमि है और मुक्तिमें सहायक है। भगवान्‌ नर और नारायण वहीं तपस्या कर चुके हैं। साथ ही, हिमालय सब पर्वतोंका राजा भी है। इसीलिये उसको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ४. पीपलका वृक्ष समस्त वनस्पतियोंमें राजा और पूजनीय माना गया है। पुराणोंमें अश्वत्थका बड़ा माहात्म्य मिलता है। स्कन्दपुराणमें कहा है-- स एव विष्णुर्द्रम एव मूर्तो महात्मभि: सेवितपुण्यमूल: । यस्याश्रय: पापसहख्रहन्ता भवेन्नणां कामदुघो गुणाढ्य: ।। (नागर० २४७।४४) “यह वृक्ष मूर्तिमान्‌ श्रीविष्णुस्वरूप है; महात्मा पुरुष इस वृक्षके पुण्यमय मूलकी सेवा करते हैं। इसका गुणोंसे युक्त और कामनादायक आश्रय मनुष्योंके हजारों पापोंका नाश करनेवाला है।” इसलिये भगवान्‌ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है। ५. देवर्षिके लक्षण इसी अध्यायके बारहवें, तेरहवें श्लोकोंकी टिप्पणीमें दिये गये हैं, उन्हें वहाँ पढ़ना चाहिये। ऐसे देवर्षियोंमें नारदजी सबसे श्रेष्ठ हैं। साथ ही वे भगवानके परम अनन्य भक्त, महान्‌ ज्ञानी और निपुण मन्त्रद्रष्टा हैं। इसीलिये नारदजीको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ६. गन्धर्व एक देवयोनिविशेष है; ये देवलोकमें गान, वाद्य और नाट्याभिनय किया करते हैं। स्वर्गमें ये सबसे सुन्दर और अत्यन्त रूपवान्‌ माने जाते हैं। “गुह्मक-लोक” से ऊपर और “विद्याधर-लोक' से नीचे इनका “गन्धर्व-लोक' है। देवता और पितरोंकी भाँति गन्धर्व भी दो प्रकारके होते हैं--मर्त्य और दिव्य। जो मनुष्य मरकर पुण्यबलसे गन्धर्वलोकको प्राप्त होते हैं, वे 'मर्त्य” हैं और जो कल्पके आरम्भसे ही गन्धर्व हैं, उन्हें “दिव्य” कहते हैं। दिव्य गन्धरवोंकी दो श्रेणियाँ हैं--'मौनेय” और “प्राधेय”। महर्षि कश्यपकी दो पत्नियोंके नाम थे--मुनि और प्राधा। इन्हींसे अधिकांश अप्सराओं और गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई। चित्ररथ दिव्य संगीतविद्याके पारदर्शी और अत्यन्त ही निपुण हैं। इसीसे भगवानने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। ७. जो सर्व प्रकारकी स्थूल और सूक्ष्म जगत्‌की सिद्धियोंको प्राप्त हों तथा धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य आदि श्रेष्ठ गुणोंसे पूर्णतया सम्पन्न हों, उनको सिद्ध कहते हैं। ऐसे हजारों सिद्ध हैं, जिनमें भगवान्‌ कपिल सर्वप्रधान हैं। भगवान्‌ कपिल साक्षात्‌ ईश्वरके अवतार हैं। इसीलिये भगवानने समस्त सिद्धोंमें कपिल मुनिको अपना स्वरूप बतलाया है। ८. बहुत-से हाथियोंमें जो श्रेष्ठ हो, उसे गजेन्द्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रोंमें भी ऐरावत हाथी, जो इन्द्रका वाहन है, सर्वश्रेष्ठ और “गज” जातिका राजा माना गया है। इसकी उत्पत्ति भी उच्चै:श्रवा घोड़ेंकी भाँति समुद्रमन्थनसे ही हुई थी। इसलिये इसको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। $. शास्त्रोक्त लक्षणोंसे युक्त धर्मपरायण राजा अपनी प्रजाको पापोंसे हटाकर धर्ममें प्रवृत्त करता है और सबकी रक्षा करता है, इस कारण अन्य मनुष्योंसे राजा श्रेष्ठ माना गया है। ऐसे राजामें भगवान्‌की शक्ति साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा अधिक रहती है। इसीलिये भगवानने राजाको अपना स्वरूप कहा है। २. जितने भी शस्त्र हैं, उन सबमें वज्र अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वजमें दधीचि ऋषिके तपका तथा साक्षात्‌ भगवान्‌का तेज विराजमान है और उसे अमोघ माना गया है (श्रीमद्धागवत ६

Petikan ini ialah nota penjelasan tentang ajaran “vibhūti”: Tuhan menunjuk kepada wakil yang paling unggul dan paling membawa manfaat dalam setiap golongan—Śambhu (Śiva) antara para penguasa dan pemberi kesejahteraan, Agni antara para Vasu, Sumeru antara gunung-ganang, Bṛhaspati antara para pendeta dan guru, Skanda antara para panglima, Bhṛgu antara para resi agung, Praṇava (Oṁ) antara kata-kata, japa antara korban suci, Himālaya antara yang tidak bergerak, Aśvattha antara pepohon, Nārada antara resi ilahi, Citraratha antara Gandharva, Kapila antara yang sempurna, Airāvata antara gajah, raja yang adil antara manusia, dan vajra antara senjata. Dari segi etika, maksudnya: keunggulan bukan kebetulan; apa yang paling melindungi, mengangkat, mengajar, dan memimpin orang lain menuju dharma patut dikenali sebagai manifestasi kehadiran Ilahi di dunia.

Verse 34

भीष्मपर्वणि तु चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय:,भीष्मपर्वमें चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Dalam Bhīṣma Parva, bab yang ketiga puluh empat berakhir di sini. (Ini ialah baris penutup bergaya kolofon yang menandai tamatnya bab dalam edisi Gītā Press, bukan ucapan yang menggerakkan dialog atau ajaran.)

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to live and act without becoming ethically and psychologically bound by pleasure-seeking (sattva), compulsive striving (rajas), or negligent inertia (tamas), especially under high-stakes duty contexts.

Recognize guṇas as operative conditions of prakṛti, cultivate discerning witnessing and equanimity, and use steady devotion and disciplined conduct to move beyond guṇic compulsion toward liberation.

A direct phalaśruti formula is not foregrounded; instead, the chapter states results: transcending guṇas frees one from birth-death-aging-sorrow and leads to brahma-bhāva, with Kṛṣṇa positioned as the foundation of brahman and enduring dharma.

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