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Shloka 14

Āśvamedhika-parva, Adhyāya 14

Consolation of Yudhiṣṭhira; Rites and Gifts; Return to Hastināpura

एवं नातिमहान्‌ काल: स तेषां संन्यवर्तत । कुर्वतां शौचकार्याणि भीष्मस्य निधने तदा,भीष्मकी मृत्युके पश्चात्‌ शौचकार्य सम्पन्न करते हुए पाण्डवोंका कुछ काल वहीं व्यतीत हुआ (यथा मनुर्महाराजो रामो दाशरथिर्यथा । तथा भरतसिंहो5पि पालयामास मेदिनीम्‌ ।। जैसे महाराज मनु तथा दशरथनन्दन श्रीरामने इस पृथ्वीका पालन किया था, उसी प्रकार भरतसिंह युधिष्ठिर भी भूमण्डलकी रक्षा करने लगे ।। नाधर्म्यम भवत्‌ तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जन: । बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ।। उनके राज्यमें कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुषसिंह! जैसे सत्ययुगमें समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापरमें भी हो गयी थी ।। कलिमासन्नमाविष्टं निवास्य नृपनन्दन: । भ्रातृभि: सहितो धीमान्‌ बभौ धर्मबलोद्धतः ।। कलियुगको समीप आया देख बुद्धिमान्‌ नृपनन्दन युधिष्ठिरने उसको भी निवास दिया और भाइयोंके साथ वे धर्मबलसे अजेय होकर शोभा पाने लगे ।। ववर्ष भगवान्‌ देव: काले देशे यथेप्सितम्‌ । निरामयं जगदभूत्‌ क्षुत्पिपासे न किंचन ।। भगवान्‌ पर्जन्यदेव उनके राज्यके प्रत्येक देशमें यथेष्ट वर्षा करते थे। सारा जगत्‌ रोग- शोकसे रहित हो गया था, किसीको भी भूख-प्यासका थोड़ा-सा भी कष्ट नहीं रह गया था।। आधिर्नास्ति मनुष्याणां व्यसने नाभवन्मति: । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णास्ते स्वधर्मोत्तरा: शिवा: ।। धर्म: सत्यप्रधानश्न सत्यं सद्विषयान्वितम्‌ । मनुष्योंको मानसिक व्यथा नहीं सताती थी। किसीका मन दुर्व्यसनमें नहीं लगता था। ब्राह्मण आदि सभी वर्णोके लोग स्वधर्मको ही उत्कृष्ट मानकर उसमें लगे रहते थे। सभी मंगलयुक्त थे। धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था ।। धर्मासनस्थ: सद्धरिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान्‌ ।। वर्णाश्रमान्‌ पूर्वकृतान्‌ सकलान्‌ रक्षणोद्यत: । धर्मके आसनपर बैठे हुए युधिष्छिर सत्पुरुषों, स्त्रियों, बालकों, रोगियों, बड़े-बूढ़ों तथा पूर्वनिर्मित सम्पूर्ण वर्णाश्रम-धर्मोकी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहते थे ।। अवृत्तिवृत्तिदानाय्यर्यज्ञार्थ्दीपितैरपि । आमुष्मिकं भयं नास्ति ऐहिकं कृतमेव तु । स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन्‌ प्रशासति ।। बभूव सुखमेकाग्रं तद्विशिष्टतरं परम्‌ ।। वे जीविकाहीन मनुष्योंको जीविका प्रदान करते, यज्ञके लिये धन दिलाते तथा अन्यान्य उपायोंद्वारा प्रजाकी रक्षा करते थे। अतः इहलोकका सारा सुख तो सबको प्राप्त ही था, परलोकका भी भय नहीं रह गया था। उनके शासनकालमें सारा जगत्‌ स्वर्गलोकके समान सुखद हो गया था। यहाँका एकाग्र सुख स्वर्गसे भी विशिष्ट एवं उत्तम था ।। नार्य: पतिव्रता: सर्वा रूपवत्य: स्वलंकृता: । यथोक्त वृत्ता: स्वगुणैर्ब भूवु: प्रीतिहेतव: ।। उनके राज्यकी सारी स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती, आभूषणोंसे विभूषित और शास्त्रोक्त सदाचारसे सम्पन्न होती थीं। वे अपने उत्तम गुणोंद्वारा पतिकी प्रसन्नताको बढ़ानेमें कारण होती थीं ।। पुमांस: पुण्यशीलाद्या: स्वं स्व॑ं धर्ममनुव्रता: । सुखिन: सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ।। पुरुष पुण्यशील, अपने-अपने धर्ममें अनुरक्त और सुखी थे। वे कभी सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पाप भी नहीं करते थे ।। सर्वे नराश्च नार्यश्व॒ सततं प्रियवादिन: । अजिद्यममनस: शुक्ला: बभूवु: श्रमवर्जिता: ।। सभी स्त्री-पुरुष सदा प्रिय वचन बोलते थे, मनमें कुटिलता नहीं आने देते थे, शुद्ध रहते थे और कभी थकावटका अनुभव नहीं करते थे ।। भूषिता: कुण्डलैहरि: कटकै: कटिसूत्रकै: । सुवासस: सुगन्धाढ्या: प्रायश: पृथिवीतले ।। उन दिनों प्रायः भूतलके सभी मनुष्य कुण्डल, हार, कड़े और करधनीसे विभूषित थे। सुन्दर वस्त्र और सुन्दर गन्धसे सुशोभित होते थे ।। सर्वे ब्रह्म॒विदो विप्रा: सर्वत्र परिनिष्ठिता: । वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घजीविन: ।। सभी ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता और समस्त शास्त्रोंमें परिनिष्ठित थे। उनके शरीरमें झुर्रियाँ नहीं पड़ती थीं, उनके बाल सफेद नहीं होते थे और वे सुखी तथा दीर्घजीवी होते थे ।। इच्छा न जायते<न्यत्र वर्णेषु च न संकर:ः । मनुष्याणां महाराज मर्यादासु व्यवस्थित: ।। महाराज! मनुष्योंकी इच्छा परायी स्त्रियोंके लिये नहीं होती थी, वर्णोमें कभी संकरता नहीं आती थी और सब लोग मर्यादामें स्थित रहते थे ।। तस्मिज्छासति राजेन्द्रे मृग्यालसरीसूपा: । अन्योन्यमपि चान्येषु न बाधन्ते कदाचन ।। राजेन्द्र युधिष्ठिरके शासनकालमें हिंसक पशु, सर्प और बिच्छू आदि न तो आपसमें और न दूसरोंको ही कभी बाधा पहुँचाते थे ।। गाव: सुक्षीर भूयिष्ठा: सुवालधिमुखोदरा: । अपीडिता: कर्षकाद्यै््वतव्याधितवत्सका: ।। गौएँ बहुत दूध देती थीं, उनके मुख, पूँछ और उदर सुन्दर होते थे। किसान आदि उन्हें पीड़ा नहीं देते थे और उनके बछड़े भी नीरोग होते थे ।। अवन्ध्यकाला मनुजा: पुरुषार्थेषु च क्रमात्‌ विषयेष्वनिषिद्धेषु वेदशास्त्रेषु चोद्यता: ।। उस समयके सभी मनुष्य अपने समयको व्यर्थ नहीं जाने देते थे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष--इन पुरुषार्थोमें क्रमशः प्रवृत्त होते थे। शास्त्रमें जिनका निषेध नहीं किया गया है, उन्हीं विषयोंका सेवन करते और वेदशास्त्रोंके स्वाध्यायके लिये सदा उद्यत रहते थे ।। सुवृत्ता वृषभा: पुष्टा: सुस्वभावा: सुखोदया: । अतीव मधुर: शब्द: स्पर्शश्वातिसुखं रसम्‌ । रूप॑ दृष्टिक्षमं रम्यं मनोज्ञं गन्धवद्‌ बभौ ।। उस समयके बैल अच्छी चाल-ढालवाले, हृष्ट-पुष्ट, अच्छे स्वभाववाले और सुखकी प्राप्ति करानेवाले होते थे। उन दिनों शब्द और स्पर्श नामक विषय अत्यन्त मधुर होते थे। रस बहुत ही सुखद जान पड़ता था, रूप दर्शनीय एवं रमणीय प्रतीत होता था और गन्ध नामक विषय भी मनोरम जान पड़ता था |। धर्मार्थकामसंयुक्त मोक्षाभ्युदयसा धनम्‌ | प्रह्नादजननं पुण्यं सम्बभूवाथ मानसम्‌ ।। सबका मन धर्म, अर्थ और काममें संलग्न, मोक्ष और अभ्युदयके साधनमें तत्पर, आनन्दजनक और पवित्र होता था ।। स्थावरा बहुपुष्पाढ्या: फलच्छायावहास्तथा । सुस्पर्शा विषहीनाश्च सुपत्रत्वकृप्ररोहिण: ।। स्थावर (वृक्ष) बहुत-से फूलोंसे सुशोभित तथा फल और छाया देनेवाले होते थे। उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता था और वे विषसे हीन तथा सुन्दर पत्र, छाल और अंकुरसे युक्त होते थे ।॥। मनो<नुकूला: सर्वेषां चेष्टा भूस्तापवर्जिता । यथा बभूव राजर्षिस्तद्वृत्तम भवद्‌ भुवि ।। सबकी चेष्टाएँ मनके अनुकूल होती थीं। पृथ्वीपर किसी प्रकारका संताप नहीं होता था। राजर्षि युधिष्ठिर स्वयं जैसे आचार-विचारसे युक्त थे, उसीका भूतलपर प्रसार हुआ था।। सर्वलक्षणसम्पन्ना: पाण्डवा धर्मचारिण: । ज्येष्ठानुवर्तिन: सर्वे बभूवु: प्रियदर्शना: ।। समस्त पाण्डव सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, धर्मांचरण करनेवाले और बड़े भाईकी आज्ञाके अधीन रहनेवाले थे। उनका दर्शन सभीको प्रिय था ।। सिंहोरस्का जितक्रोधास्तेजोबलसमन्विता: । आजानुबाहव: सर्वे दानशीला जितेन्द्रिया: ।। उनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी। वे क्रोधपर विजय पानेवाले और तेज एवं बलसे सम्पन्न थे। उन सबकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे सभी दानशील एवं जितेन्द्रिय थे ।। तेषु शासत्सु धरणीमृतव: स्वगुणैर्बभु: । सुखोदयाय वर्तन्ते ग्रहास्तारागणै: सह ।। पाण्डव जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय सभी ऋतुएँ अपने गुणोंसे सुशोभित होती थीं। ताराओंसहित समस्त ग्रह सबके लिये सुखद हो गये थे ।। मही सस्यप्रबहुला सर्वरत्नगुणोदया । कामधुग्धेनुवद्‌ भोगान्‌ फलति सम सहस्रधा ।। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बढ़ गयी थी। सभी रत्न और गुण प्रकट हो गये थे। कामधेनुके समान वह सहसोरं प्रकारके भोगरूप फल देती थी ।। मन्वादिश्रि: कृताः पूर्व मर्यादा मानवेषु या: । अनतिक्रम्य ता: सर्वा: कुलेषु समयानि च । अन्वशासन्त राजानो धर्मपुत्रप्रियंकरा: ।। पूर्वकालमें मनु आदि राजर्षियोंने मनुष्योंमें जो मर्यादाएँ स्थापित की थीं, उन सबका तथा कुलोचित सदाचारोंका उल्लंघन न करते हुए भूमण्डलके सभी राजा अपने-अपने राज्यका शासन करते थे। इस प्रकार सभी भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले थे ।। महाकुलानि धर्मिष्ठा वर्धयन्तो विशेषत: । मनुप्रणीतया कृत्या तेडन्वशासन्‌ वसुन्धराम्‌ ।। धर्मिष्ठ राजा श्रेष्ठ कुलोंको विशेष प्रोत्साहन देते थे। वे मनुकी बनायी हुई राजनीतिके अनुसार इस वसुधाका शासन करते थे ।। राजव॒त्तिहिं सा शश्व॒द्‌ धर्मिष्ठाभून्महीतले । प्रायो लोकमतिस्तात राजवृत्तानुगामिनी ।। तात! इस पृथ्वीपर राजाओंके बर्ताव सदा धर्मानुकूल होते थे। प्राय: लोगोंकी बुद्धि राजाके ही बर्तावका अनुसरण करनेवाली होती है ।। एवं भारतवर्ष स्वं राजा स्वर्ग सुरेन्द्रवत्‌ । शशास विष्णुना सार्ध गुप्तो गाण्डीवधन्चना ।।) जैसे इन्द्र स्वर्गका शासन करते हैं, उसी प्रकार गाण्डीवधारी अर्जुनसे सुरक्षित राजा युधिष्ठिर भगवान्‌ श्रीकृष्णके सहयोगसे अपने राज्य--भारतवर्षका शासन करते थे ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि चतुर्दशो5ध्याय:

evaṁ nātimahān kālaḥ sa teṣāṁ saṁnyavartata | kurvatāṁ śaucakāryāṇi bhīṣmasya nidhane tadā ||

Vaiśaṃpāyana berkata: Selepas kematian Bhīṣma, ketika para Pāṇḍava melaksanakan upacara penyucian dan perkabungan yang ditetapkan menurut dharma, tidak lama pun berlalu ketika mereka tetap berada di situ, tekun dalam tugas-tugas yang khusyuk itu. Rangkap ini menandai peralihan yang hening: daripada keganasan kehilangan kepada pemulihan tertib yang berdisiplin—duka diakui melalui amalan dharma, dan masyarakat dipersiapkan untuk kembali dari berkabung kepada pemerintahan yang benar.

एवम्thus
एवम्:
TypeIndeclinable
Rootएवम्
not
:
TypeIndeclinable
Root
अति-महान्very great/excessively long
अति-महान्:
TypeAdjective
Rootअतिमहान्
FormMasculine, Nominative, Singular
कालःtime/period
कालः:
Karta
TypeNoun
Rootकाल
FormMasculine, Nominative, Singular
सःthat/he
सः:
Karta
TypePronoun
Rootतद्
FormMasculine, Nominative, Singular
तेषाम्of them
तेषाम्:
TypePronoun
Rootतद्
FormMasculine/Neuter, Genitive, Plural
संन्यवर्ततcame to an end/ceased/elapsed
संन्यवर्तत:
TypeVerb
Rootसम्-नि-वृत्
FormImperfect, 3, Singular, Atmanepada
कुर्वताम्of (those) doing
कुर्वताम्:
TypeVerb
Rootकृ
FormPresent active participle (शतृ), Masculine/Neuter, Genitive, Plural
शौच-कार्याणिpurificatory rites/acts of purification
शौच-कार्याणि:
Karma
TypeNoun
Rootशौचकार्य
FormNeuter, Accusative, Plural
भीष्मस्यof Bhīṣma
भीष्मस्य:
TypeNoun
Rootभीष्म
FormMasculine, Genitive, Singular
निधनेat the death/demise
निधने:
Adhikarana
TypeNoun
Rootनिधन
FormNeuter, Locative, Singular
तदाthen/at that time
तदा:
TypeIndeclinable
Rootतदा

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśaṁpāyana
B
Bhīṣma
P
Pāṇḍavas

Educational Q&A

Even in the aftermath of immense loss, dharma requires structured response: grief is not denied, but regulated through śauca (purificatory and mourning observances). The verse highlights ethical continuity—ritual discipline becomes the bridge from death and disorder back to stability and righteous life.

Following Bhīṣma’s demise, the Pāṇḍavas remain on site and carry out the required śaucakāryas. The narrator notes that this period does not last long, signaling a transition from funeral observances toward the next phase of the story—re-establishing governance and public order.