अध्याय १२८: शिव–उमा संवादः — तिलोत्तमा, श्मशान-मेध्यता, तथा चातुर्वर्ण्य-धर्मः
Chapter 128: Śiva–Umā Dialogue—Tilottamā, the Ritual Valence of the Śmaśāna, and the Fourfold Duty-Code
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ श्लोक मिलाकर कुल २५३ “लोक हैं) शीसस्नश्शास्स | भ्निध्ॉप्राध्य चतुर्विशत्यधिकशततमो< ध्याय: नारदका पुण्डरीकको भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना (युधिष्टिर उवाच यज्ज्ञेयं परमं कृत्यमनुछेयं महात्मभि: । सारं मे सर्वशास्त्राणां वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ।। युधिष्ठिरने कहा--पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका सार है, उस श्रेयका कृपापूर्वक वर्णन कीजिये ।। भीष्म उवाच श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम् । श्रोतव्यं च त्वया सम्यग् ज्ञातव्यं च विशाम्पते ।। भीष्मजीने कहा--प्रजानाथ! जो अत्यन्त गूढ़, संसारबन्धनसे मुक्त करनेवाला और तुम्हारे द्वारा श्रवण करने एवं भलीभाँति जाननेके योग्य है, उस परम श्रेयका वर्णन सुनो ।। पुण्डरीकः पुरा विप्र: पुण्यतीर्थे जपान्वित: । नारदं परिपप्रच्छ श्रेयो योगपरं मुनिम् ।। नारदश्षाब्रवीदेनं ब्रह्मणोक्त महात्मना ।। प्राचीन कालकी बात है, पुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण किसी पुण्यतीर्थमें सदा जप किया करते थे। उन्होंने योगपरायण मुनिवर नारदजीसे श्रेय (कल्याणकारी साधन) के विषयमें पूछा। तब नारदजीने महात्मा ब्रह्माजीके द्वारा बताये हुए श्रेयका उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया ।। नारद उवाच शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम् । अप्रभूत॑ प्रभूतार्थ वेदशास्त्रार्थसारकम् ।। नारदजीने कहा--तात! तुम सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका वर्णन सुनो। यह किसी व्यक्ति-विशेषसे नहीं प्रकट हुआ है--अनादि है, प्रचुर अर्थका साधक है तथा वेदों और शास्त्रोंके अर्थका सारभूत है ।। यः पर: प्रकृतेः प्रोक्त: पुरुष: पजचविंशक: । स एव सर्वभूतात्मा नर इत्यभिधीयते ।। जो चौबीस तत्त्वमयी प्रकृतिसे उसका साक्षिभूत पचीसवाँ तत्त्व पुरुष कहा गया है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, उसीको नर कहते हैं ।। नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः । तान्येव चायन॑ तस्य तेन नारायण: स्मृतः ।। नरसे सम्पूर्ण तत्त्व प्रकट हुए हैं, इसलिये उन्हें नार कहते हैं। नार ही भगवानूका अयन --निवासस्थान है, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं ।। नारायणाज्जगत् सर्व सर्गकाले प्रजायते । तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ।। सृष्टिकालमें यह सारा जगत् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयकालमें फिर उन्हींमें इसका लय होता है ।। नारायण: पर ब्रह्म तत्त्व नारायण: पर: । परादपि परश्नासौ तस्मान्नास्ति परात् परम् ।। नारायण ही परब्रह्म हैं, परमपुरुष नारायण ही सम्पूर्ण तत्त्व हैं, वे ही परसे भी परे हैं। उनके सिवा दूसरा कोई परात्पर तत्त्व नहीं है ।। वासुदेव॑ तथा विष्णुमात्मानं च तथा विदु: । संज्ञाभेदै: स एवैक: सर्वशास्त्राभिसंस्कृत: ।। उन्हींको वासुदेव, विष्णु तथा आत्मा कहते हैं। संज्ञाभेदसे एकमात्र नारायण ही सम्पूर्ण शास्त्रोंद्वारा वर्णित होते हैं ।। आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुन: पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायण: सदा ।। समस्त शास्त्रोंका आलोडन करके बारंबार विचार करनेपर एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर हुआ है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये ।। तस्मात्त्वं गहनान् सर्वास्त्यक्त्वा शास्त्रार्थविस्तरान् | अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमजं विभुम् ।। अतः तुम शात्त्रार्थके सम्पूर्ण गहन विस्तारका त्याग करके अनन्यचित्त होकर सर्वव्यापी अजन्मा भगवान् नारायणका ध्यान करो ।। मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रित: । सो<पि सद्गतिमाप्नोति कि पुनस्तत्परायण: ।। जो आलस्य छोड़कर दो घड़ी भी नारायणका ध्यान करता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है। फिर जो निरन्तर उन्हींके भजन-ध्यानमें तत्पर रहता है, उसकी तो बात ही क्या है।। नमो नारायणायेति यो वेद ब्रह्म शाश्वतम् । अन्तकाले जपन्नेति तद्विष्णो: परमं पदम् ।। जो “७9० नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्रको सनातन ब्रह्मरूप जानता है और अन्तकालमें इसका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ।। श्रवणान्मननाच्चैव गीतिस्तुत्यर्चनादिभि: । आराध्यं सर्वदा ब्रह्म पुरुषेण हितैषिणा ।। जो मनुष्य अपना हित चाहता हो, वह सदा श्रवण, मनन, गीत, स्तुति और पूजन आदिके द्वारा सर्वदा ब्रह्मस्वरूप नारायणकी आराधना करे ।। लिप्यते न स पापेन नारायणपरायण: । पुनाति सकल॑ लोकं॑ सहस्रांशुरिवोदित: ।। नारायणके भजनमें तत्पर रहनेवाला पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता। वह उदित हुए सहस्र किरणोंवाले सूर्यकी भाँति समस्त लोकको पवित्र कर देता है ।। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो5थ भिक्षुक: । केशवाराधन हित्वा नैव यान्ति परां गतिम् ।। ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ, वानप्रस्थ हो या संन्यासी, भगवान् विष्णुकी आराधना छोड़ देनेपर ये कोई भी परम गतिको नहीं प्राप्त होते हैं ।। जन्मान्तरसहस्रेषु दुर्लभा तद्गता मति: । तद्धभक्तवत्सलं देवं समाराधय सुव्रत ।। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुण्डरीक! सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी भगवान् विष्णुमें मन और बुद्धिका लगना अत्यन्त दुर्लभ है। अतः तुम उन भक्तवत्सल नारायणदेवकी भलीभाँति आराधना करो ।। भीष्म उवाच नारदेनैवमुक्तस्तु स विप्रो5भ्यर्चयद्धरिम् । स्वप्नेडपि पुण्डरीकाक्षं शड्खचक्रगदाधरम् ।। किरीटकुण्डलथरं लसच्छीवत्सकौस्तु भम् । त॑ दृष्टवा देवदेवेशं प्राणमत् सम्भ्रमान्वित: ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्! नारदजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर विप्रवर पुण्डरीक भगवान् श्रीहरिकी आराधना करने लगे। वे स्वप्रमें भी शंख-चक्र गदाधारी, किरीट और कुण्डलसे सुशोभित, सुन्दर श्रीवत्स-चिह्न एवं कौस्तुभभणि धारण करनेवाले कमलनयन नारायण देवका दर्शन करते थे और उन देवदेवेश्वरको देखते ही बड़े वेगसे उठकर उनके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करते थे ।। अथ कालेन महता तथा प्रत्यक्षतां गत: । संस्तुतः स्तुतिभिवेंदिर्देवगन्धर्वकिन्नरै: ।। तदनन्तर दीर्घकालके बाद भगवानने उसी रूपमें पुण्डरीकको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय सम्पूर्ण वेद तथा देवता, गन्धर्व और किन्नर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते थे ।। अथ तेनैव भगवानात्मलोकमधोक्षज: । गत: सम्पूजित: सर्व: स योगनिलयो हरि: ।। योग ही जिनका निवासस्थान है, वे भगवान् अधोक्षज श्रीहरि सबके द्वारा पूजित हो उस भक्त पुण्डरीकको साथ लेकर ही पुनः अपने धामको चले गये ।। तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र तद्धभक्तस्तत्परायण: । अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम् ।। राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भगवान्के भक्त एवं शरणागत होकर उनकी यथायोग्य पूजा करके उन्हीं पुरुषोत्तमके भजनमें लगे रहो ।। अजरममसरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् । निरुपममुपमेयं योगिविज्ञानगम्यं त्रिभुवनगुरुमीशं सम्प्रपद्यस्व विष्णुम् ।।) जो अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्येय, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, उपमाके योग्य तथा योगियोंके लिये ज्ञान-गम्य हैं, उन त्रिभुवनगुरु भगवान् विष्णुकी शरण लो ।। युधिछिर उवाच साम्नि चापि प्रदाने च ज्याय: कि भवतो मतम् | प्रत्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ] आपके मतमें साम और दानमें कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये
yudhiṣṭhira uvāca |
sāmni cāpi pradāne ca jyāyaḥ kiṃ bhavato matam |
brūhi bharataśreṣṭha yad atra vyatiricyate ||
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang terbaik dalam kalangan Bharata, pada pertimbanganmu yang manakah lebih utama—sāman (pendamaian/pendekatan lunak) atau dāna (pemberian)? Nyatakan kepadaku yang mana lebih unggul dalam hal ini.”
युधिछिर उवाच
The verse frames an ethical and practical inquiry in statecraft: when seeking to achieve an end (especially in governance or dispute), which method is preferable—winning others through conciliation (sāman) or through giving/concessions (dāna)? It invites a nuanced hierarchy of means rather than assuming force as the default.
Within the Anuśāsana Parva’s instruction-focused dialogue, Yudhiṣṭhira asks an elder authority (addressed as ‘best of the Bharatas’) to compare two classical diplomatic strategies—sāman and dāna—and to state which is superior in the given context.