एवं युक्तो महाराज: पाण्डव: पार्थिवर्षभ: । कथं नाहति राजाहमासनं पृथिवीपते,नरेश्वर! इनके सदगुणोंकी गणना नहीं की जा सकती। ये पाण्डुनन्दन नित्य धर्मपरायण तथा दयालु स्वभावके हैं। राजन! समस्त राजाओंके शिरोमणि पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर इस प्रकार सर्वोत्तम गुणोंसे युक्त होकर भी राजोचित आसनके अधिकारी क्यों नहीं हैं?
evaṁ yukto mahārājaḥ pāṇḍavaḥ pārthivarṣabhaḥ | kathaṁ nārhati rājāham āsanaṁ pṛthivīpate nareśvara ||
हे पृथ्वीपते! अशा गुणांनी युक्त हा पांडव—राजांमध्ये श्रेष्ठ—राजोचित आसनाचा अधिकारी कसा नसावा?
अर्जुन उवाच