धनंजय-दुर्योधन-संग्रामः
Arjuna–Duryodhana Engagement and Admonition
तस्य भिन्त्वा तनुत्राणं कायम भ्यगमच्छर: । ततः स तमसा<<विष्टो न सम किंचित् प्रजज्ञिवान्,यह बाण कर्णका कवच काटकर उसके वक्षःस्थलके भीतर घुस गया। इससे कर्णको मूर्च्छा आ गयी और उसे किसी भी बातकी सुध-बुध न रही
tasya bhittvā tanutrāṇaṃ kāyam abhyagamac charaḥ | tataḥ sa tamasāviṣṭo na samaṃ kiñcit prajajñivān |
तो बाण कर्णाचे कवच भेदून त्याच्या देहात घुसला; मग तो तमाने व्यापला गेला—मूर्च्छित होऊन त्याला काहीच नीट कळेना।
वैशम्पायन उवाच