भीमस्य बल्लव-प्रतिज्ञा तथा अर्जुनस्य बृहन्नडा-रूप-निर्णयः
Bhīma’s Ballava Vow and Arjuna’s Decision to Become Bṛhannadā
तान्यप्यभिभविष्यामि प्रीति संजनयन्नहम् । मैं रसोई बनानेके काममें चतुर हूँ। अपने ऊपर राजाके मनमें अत्यन्त प्रेम उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे उनके लिये सूप (दाल, कढ़ी एवं साग आदि) तैयार करूँगा और पाककलामें भलीभाँति शिक्षा पाये हुए चतुर रसोइयोंने राजाके लिये पहले जो-जो व्यंजन बनाये होंगे, उन्हें भी अपने बनाये हुए व्यंजनोंसे तुच्छ सिद्ध कर दूँगा,कर्णयो: प्रतिमुच्याहं कुण्डले ज्वलनप्रभे मैं दोनों कानोंमें अग्निके समान कान्तिमान् कुण्डल पहनकर हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ धारण कर लूँगा। इस प्रकार तीसरी प्रकृति (नपुंसकभाव)-को अपनाकर सिरपर चोटी गूँथ लूँगा और अपनेको बृहन्नला नामसे घोषित करूँगा
tāny apy abhibhaviṣyāmi prīti sañjanayann aham |
भीमसेन म्हणाला—राजाच्या मनात प्रेम उत्पन्न करीत मी त्या कुशल स्वयंपाक्यांनाही मागे टाकीन. त्याच्या अंतःकरणात दृढ सद्भाव जागविण्याच्या हेतूने मी त्याच्यासाठी सूप, डाळ, कढी, साग इत्यादी पदार्थ तयार करीन; आणि पूर्वी जे सुशिक्षित, चतुर स्वयंपाकी राजासाठी जे-जे रुचकर पदार्थ बनवीत, ते माझ्या पदार्थांपुढे तुच्छ ठरवीन.
भीमसेन उवाच