Tīrtha-yātrā: Prayāga-saṅgama and Gayaśiras—Rājarṣi Gaya’s Mahāyajña
भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्थ भारत । अष्टकस्य च राजर्षेलॉमपादस्य चैव ह,'भूपाल! भरतनन्दन! आप भी तीर्थोमें नहाकर राजा कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षि अष्टक, लोमपाद और भूमण्डलमें सर्वत्र विदित सम्राट् वीरवर भरतको मिलनेवाले दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त कर लेंगे
हे भूपाल, हे भरतनंदन! आपणही तीर्थांत स्नान करून नरेन्द्र कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षी अष्टक आणि लोमपाद यांच्यासारख्या पुण्यलोकांचे अधिकारी व्हाल.
वैशम्पायन उवाच