Śiva Grants the Pāśupata Astra (Pāśupata-Śastra Upadeśa) | शिवेन पाशुपतास्त्रदानम्
संस्तूयमानो गन्धर्वैर्क्षिभिश्न तपोधनै: । शूडूं गिरे: समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदित:,उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे शुभ्र वर्णके मेघखण्डसे आच्छादित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे। बहुत-से तपस्वी-ऋषि तथा गन्धर्वगण उनकी स्तुति करते थे। वे उस पर्वतके शिखरपर आकर ठहर गये, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गये हों
saṁstūyamāno gandharvair ṛṣibhiś ca tapodhanaiḥ | śūḍuṁ gireḥ samāsādya tasthau sūrya ivoditaḥ ||
गंधर्व व तपोधन ऋषी यांच्या स्तुतीने गौरविला जाऊन तो शूडु पर्वताच्या शिखरावर पोहोचला आणि तेथे असा उभा राहिला, जणू सूर्यच उदयास आला।
वैशम्पायन उवाच