एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वर: । शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुल:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “यह ऐसी ही होनहार है”, ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर शोकसागरमें मग्न तथा व्याकुल होकर भाइयोंकी मृत्युके कारणपर विचार करने लगे
evaṁ evेदam ity uktvā dharmātmā sa nareśvaraḥ | śokasāgaramadhyastho dadhyau kāraṇam ākulaḥ || dharmaputro mahābāhur vilalāpa suvistaram ||
वैशंपायन म्हणाले— “हो, असेच व्हायचे होते—हेच खरे,” असे म्हणून धर्मात्मा नरेश्वर युधिष्ठिर शोकसागराच्या मध्यभागी उभा असल्यासारखा व्याकुळ होऊन कारणाचा विचार करू लागला। मग महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिर फार वेळ विलाप करीत राहिला, जणू या आपत्तीमागील गूढ धर्मकारण शोधीत होता।
वैशग्पायन उवाच