रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणी,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?
vaiśaṃpāyana uvāca | raṇe pramattau vīrau ca sadā śatrunibarhaṇī | dharmaputro mahābāhur vilalāpa suvistaram ||
वैशंपायन म्हणाले— रणात उन्मत्त होऊन लढणारे आणि सदैव शत्रुनाश करणारे ते दोन वीर असे पडलेले पाहून महाबाहू धर्मपुत्र युधिष्ठिर दीर्घकाळ विलाप करू लागला— “कुंतीचे हे दोन महाबली पुत्र—भीमसेन आणि धनंजय—जे कोणत्याही अस्त्राने प्रतिहत न होणारे, समरात उन्मत्त राहणारे आणि सदैव शत्रूंचा संहार करणारे होते, ते आज अचानक शत्रूच्या अधीन कसे झाले?”
वैशग्पायन उवाच
Even the most celebrated strength and martial excellence can be overturned by adverse fate; dharma is tested not only in victory but in how one responds to sudden loss—through truthful recognition of suffering, restraint, and renewed discernment rather than despair.
Vaiśaṃpāyana narrates that Yudhiṣṭhira, seeing renowned warriors who habitually crush enemies now seemingly overcome, breaks into prolonged lamentation—an emotional and ethical reaction to an unexpected reversal in battle.