Dharma-pratyabhijñāna and Vara-pradāna (धर्मप्रत्यभिज्ञानम्—वरप्रदानम्)
चतुर्थे5हनि मर्तव्यमिति संचिन्त्य भाविनी । व्रतं त्रिरात्मुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताभवत्,भाविनी सावित्रीको जब यह निश्चय हो गया कि मेरे पतिको आजसे चौथे दिन मरना है, तब उसने तीन रातका व्रत धारण किया और उसमें वह दिन-रात खड़ी ही रही
caturthe 'hani martavyam iti sañcintya bhāvinī | vrataṃ trirātram uddiśya divārātraṃ sthitābhavat ||
“चौथ्या दिवशी त्याचा मृत्यू निश्चित आहे” असे मनात ठरवून धैर्यवती सावित्रीने तीन रात्रींचे व्रत घेतले; ती दिवस-रात्र उभीच राहिली।
मार्कण्डेय उवाच