Sātyaki’s Call for Intervention and Yudhiṣṭhira’s Vow-Bound Restraint (सात्यकिवाक्यं—धर्मराजस्य धैर्यनिश्चयः)
विसृज्य कृष्णं त्वथ धर्मराजो विदर्भराजोपचितां सुतीर्थाम् जगाम पुण्यां सरितं पयोष्णीं सभ्रातृभृत्य: सह लोमशेन,श्रीकृष्णको विदा करके धर्मराज युधिष्ठिर लोमशजी, भाइयों और सेवकोंके साथ विदर्भनरेशद्वारा पूजित, उत्तम तीर्थोंवाली पुण्य नदी पयोष्णीके तटपर गये
श्रीकृष्णाला विदा करून धर्मराज युधिष्ठिर लोमश मुनी, भाऊ आणि सेवकांसह, विदर्भराजाने पूजिलेली व उत्तम तीर्थांनी युक्त अशी पुण्य पयोष्णी नदीकाठी गेले.
युधिछिर उवाच