Prabhāsa-tīrthe Vṛṣṇi–Pāṇḍava-saṅgamaḥ; Halī Rāmasya dharma-vimarśaḥ
Meeting at Prabhāsa and Balarāma’s Reflection on Dharma
प्राच्यां नृूपानेकरथेन जित्वा वृकोदर: सानुचरान् रणेषु । स्वस्त्यागमद् योडतिरथस्तरस्वी सो<यं वने क्लिश्यति चीरवासा:,जो पूर्वदिशामें (दिग्विजयकी यात्राके समय) केवल एक रथ लेकर युद्धमें बहुत-से राजाओंको सेवकोंसहित परास्त करके सकुशल लौट आये थे, वे ही अतिरथी और वेगशाली वीर वृकोदर आज वनमें वल्कल वस्त्र पहनकर कष्ट भोग रहे हैं। जिसने समुद्र- तटपर सामना करनेके लिये आये हुए दक्षिण दिशाके सम्पूर्ण राजाओंपर विजय पायी थी, उसी वेगवान् वीर इस सहदेवको देखो--यह आज तपस्वीकी-सी वेषभूषा धारण किये हुए दुःख पा रहा है
prācyāṁ nṛpān aneka-rathena jitvā vṛkodaraḥ sānucarān raṇeṣu | svasty āgamad yo ’ti-rathas tarasvī so ’yaṁ vane kliśyati cīra-vāsāḥ ||
बलराम म्हणाले—पूर्व दिशेत एकाच रथाने रणात अनेक राजांना त्यांच्या अनुचरांसह जिंकून जो सुखरूप परत आला होता, तोच वेगवान अतिरथी वृकोदर आज चीरवस्त्र धारण करून वनात क्लेश भोगत आहे.
बलदेव उवाच