Dvārakāyāṃ Sāhāyya-vibhāgaḥ (Alliance Allocation at Dvārakā) / उद्योगपर्व अध्याय ७
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ।। (गीता ५।१८) संजयकी श्रीकृष्ण एवं पाण्डवोंसे भेंट कौरव-सभामें विराट् रूप ४५0) म़्र्छ ९७:०0. ५० | संजयको दिव्य दृष्टि सबमें भगवत्-दर्शन रे 20 6) नह बन्-7 8५ रू- ९ ५३ हा हि 4-० ७ |] है जयाकनि ज भक्तोंके द्वारा प्रेमसे दिये हुए पत्र, पुष्प, फल, जल आदिको भगवान प्रत्यक्ष प्रकट होकर ग्रहण करते हैं! भीष्म और अर्जुनका युद्ध भीष्मपितामहकी सेवामें श्रीकृष्णसहित पाण्डव वायुदेव उवाच उपपन्नमिदं पार्थ यत् स्पर्थसि मया सह । सारथ्यं ते करिष्यामि काम: सम्पद्यतां तव,भगवान् श्रीकृष्णने कहा--पार्थ! तुम जो (शत्रुओंपर विजय पानेमें) मेरे साथ स्पर्धा रखते हो, यह तुम्हारे लिये ठीक ही है। मैं तुम्हारा सारथ्य करूँगा। तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण हो
vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini | śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ sama-darśinaḥ ||
विद्या व विनयाने संपन्न ब्राह्मण, गाय, हत्ती, कुत्रा आणि कुत्र्याचे मांस खाणारा—यांच्याकडेही पंडित समदृष्टीने पाहतात. याचा अर्थ आचारधर्मातील भेद नष्ट करणे नव्हे; तर सर्व प्राण्यांत एकच अंतरात्मा आहे हे ओळखून जात-पद-प्रजातीभेदातून येणारा तिरस्कार, क्रूरता व पक्षपात आवरावा हा आहे.
वायुदेव उवाच
True wisdom expresses itself as sama-darśana—seeing the same inner Self in all beings—thereby curbing pride, hatred, and discrimination, and grounding ethical conduct in compassion and restraint.
The verse is a doctrinal statement rather than a plot event: it presents a standard of the paṇḍita (the truly wise) as one who maintains an equal, non-contemptuous vision across social categories and species, emphasizing inner reality over external status.