Sañjaya’s Knowledge of Keśava and the Discipline of Indriya-nigraha (संजयस्य केशवज्ञानम्—इन्द्रियनिग्रह-उपदेशः)
असजन कार (.) आ+औअन+- अष्टषष्टितमो< ध्याय: संजयका धृतराष्ट्रको भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा बतलाना संजय उवाच अर्जुनो वासुदेवश्च धन्विनौ परमार्चितौ | कामादन्यत्र सम्भूतौ सर्वभावाय सम्मितौ,संजयने कहा--राजन्! अर्जुन तथा भगवान् श्रीकृष्ण दोनों बड़े सम्मानित धनुर्थर हैं। वे (यद्यपि सदा साथ रहनेवाले नर और नारायण हैं, तथापि) लोककल्याणकी कामनासे पृथक्-पृथक् प्रकट हुए हैं और सब कुछ करनेमें समर्थ हैं
sañjaya uvāca | arjuno vāsudevaś ca dhanvinau paramārcitau | kāmād anyatra sambhūtau sarvabhāvāya sammitau ||
संजय म्हणाला—राजन्! अर्जुन आणि वासुदेव (श्रीकृष्ण) हे दोघेही परमपूज्य, श्रेष्ठ धनुर्धर आहेत. स्वरूपाने नित्य एक असूनही लोककल्याणाच्या संकल्पाने ते वेगवेगळे प्रकट झाले आहेत आणि सर्व कार्यांस समर्थ आहेत.
संजय उवाच