Vidura-nīti: Atithi-dharma, Trust, Counsel-Secrecy, and Traits of Sustainable Rule
Udyoga Parva, Adhyāya 38
जो वृद्धि भविष्यमें नाशका कारण बने, उसे अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये और उस क्षयका भी बहुत आदर करना चाहिये, जो आगे चलकर अभ्युदयका कारण हो ।। न स क्षयो महाराज य: क्षयो वृद्धिमावहेत् | क्षय: स त्विह मन्तव्यो यं लब्ध्वा बहु नाशयेत्,महाराज! वास्तवमें जो क्षय वृद्धिका कारण होता है, वह क्षय नहीं है; किंतु उस लाभको भी क्षय ही मानना चाहिये, जिसे पानेसे बहुत-से लाभोंका नाश हो जाय
vidura uvāca | na sa kṣayo mahārāja yaḥ kṣayo vṛddhim āvahet | kṣayaḥ sa tv iha mantavyo yaṁ labdhvā bahu nāśayet ||
महाराज! जो क्षय पुढे जाऊन वृद्धीचे कारण ठरतो, तो खरा क्षय नाही; पण ज्याचा लाभ मिळाल्यावर अनेक लाभ नष्ट होतात, त्या लाभालाही येथे क्षयच मानावे.
विदुर उवाच