धृतराष्ट्र-संजय संवादः — उपप्लव्यगमनाज्ञा
Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Dialogue: Command to Proceed to Upaplavya
यथा राज्ञ: क्रोधदीप्तस्य सूत मन्योरहं भीततर: सदैव । महातपा ब्रह्मचर्येण युक्त: संकल्पो5यं मानसस्तस्य सिद्धयेत्,मुझे तो अर्जुन इन्द्रके समान प्रतीत होते हैं और वृष्णिवीर श्रीकृष्ण सनातन विष्णु जान पड़ते हैं। कुन्तीनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर धर्माचरणमें ही सुख मानते हैं। वे लज्जाशील और बलशाली हैं। उनके मनमें किसीके प्रति कभी शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ है। नहीं तो वे मनस्वी युधिष्ठिर दुर्योधनके द्वारा छल-कपटके शिकार होनेपर क्रोध करके मेरे सभी पुत्रोंको जलाकर भस्म कर देते। संजय! मैं अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन तथा नकुल-सहदेवसे भी उतना नहीं डरता, जितना कि क्रोधसे तमतमाये हुए राजा युधिष्ठिरके कोपसे। उनके रोषसे मैं सदा ही अत्यन्त भयभीत रहता हूँ; क्योंकि वे महान् तपस्वी और ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न हैं, इसलिये उनके मनमें जो संकल्प होगा, वह सिद्ध होकर ही रहेगा
yathā rājñaḥ krodha-dīptasya sūta manyor ahaṃ bhīta-taraḥ sadaiva | mahā-tapā brahmacaryeṇa yuktaḥ saṅkalpo 'yaṃ mānasaḥ tasya sidhyet ||
वैशंपायन म्हणाले— हे सूत! त्या राजाचा क्रोध जेव्हा प्रज्वलित होतो, तेव्हा मी त्याच्या रोषाला सदैव अधिक भितो. तो महातपस्वी असून ब्रह्मचर्याने युक्त आहे; म्हणून त्याच्या मनातील संकल्प निश्चितच सिद्ध होतो.
वैशम्पायन उवाच