Rukmī’s Offer of Aid and Arjuna’s Refusal (रुक्मिप्रस्तावः—अर्जुनप्रत्याख्यानम्)
कर्ण उवाच नाहं जीवति गाड़ेये राजन् योत्स्पे कथंचन । हते भीष्मे तु योत्स्यामि सह गाण्डीवधन्चना,कर्ण बोला--राजन! मैं गंगानन्दन भीष्मके जीते-जी किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। इनके मारे जानेपर ही गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ लड़ूँगा
karṇa uvāca | nāhaṃ jīvati gāṅgeye rājan yotsye kathaṃcana | hate bhīṣme tu yotsyāmi saha gāṇḍīvadhanvanā ||
कर्ण म्हणाला—राजन्! गंगानंदन भीष्म जिवंत असताना मी कधीही युद्ध करणार नाही. भीष्म मारला गेल्यावरच मी गाण्डीवधारी अर्जुनाशी युद्ध करीन।
कर्ण उवाच