Nahūṣa’s Pride, the Ṛṣi-Borne Palanquin, and the Search for Indra (नहुष-इन्द्राणी-प्रकरणम्)
वाक्यं॑ प्रणयसंयुक्तं ततः स्यां वशगा तव । देवराज! मेरे हृदयमें एक कार्यकी अभिलाषा है, उसे बताती हूँ, सुनिये। राजन्! यदि आप मेरे इस प्रिय कार्यको पूर्ण कर देंगे, प्रेमपूर्वक कही हुई मेरी यह बात मान लेंगे तो मैं आपके अधीन हो जाऊँगी ।। १० ह ।। इन्द्रस्य वाजिनो वाहा हस्तिनो5थ रथास्तथा,सुरेश्वर! पहले जो इन्द्र थे, उनके वाहन हाथी, घोड़े तथा रथ आदि रहे हैं, परंतु आपका वाहन उनसे सर्वथा विलक्षण--अपूर्व हो, ऐसी मेरी इच्छा है। वह वाहन ऐसा होना चाहिये, जो भगवान् विष्णु, रुद्र, असुर तथा राक्षसोंके भी उपयोगमें न आया हो
vākyam praṇaya-saṁyuktaṁ tataḥ syāṁ vaśagā tava | indrasya vājino vāhā hastino 'tha rathās tathā ||
शल्य म्हणाली—तू माझे प्रणययुक्त वचन मान्य करून माझ्या हृदयातील प्रिय इच्छा पूर्ण केलीस, तर मी पूर्णपणे तुझ्या अधीन होईन. पूर्वी इंद्रांची वाहने घोडे, हत्ती व रथ अशी होती; पण हे सुरेश्वर! तुझे वाहन सर्वथा विलक्षण, अपूर्व असावे—जे विष्णू, रुद्र, असुर वा राक्षस यांनीही कधी वापरलेले नसावे.
शल्य उवाच