Udyoga-parva Adhyāya 137 — Bhīṣma–Droṇa Counsel and the Ethics of Restraint
इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें कुन्तीवाक्यविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १३७ ॥। ऑपन--माजल बछ। अकाल अष्टात्रिशरदाधिकशततमो< ध्याय: भीष्म और द्रोणका दुर्योधनको समझाना वैशम्पायन उवाच कुन्त्यास्तु वचन श्रुत्वा भीष्मद्रोणी महारथौ । दुर्योधनमिदं वाक्यमूचतु: शासनातिगम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कुन्तीका कथन सुनकर महारथी भीष्म और द्रोणने अपनी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले दुर्योधनसे इस प्रकार कहा--
vaiśampāyana uvāca
kuntyāstu vacanaṃ śrutvā bhīṣmadroṇī mahārathau |
duryodhanam idaṃ vākyam ūcatuḥ śāsanātigam ||
वैशंपायन म्हणाले—जनमेजया! कुंतीचे वचन ऐकून महारथी भीष्म व द्रोण यांनी मर्यादा ओलांडणाऱ्या दुर्योधनाला असे सांगितले.
वैशम्पायन उवाच