Mantri-Parīkṣā — Testing Ministers, Securing Counsel, and Ethical Criteria for Advisers (अध्याय ८४)
यानर्थभाजो मन्येथास्ते ते स्यु: सुखभागिन: । तुम जिन्हें अपना प्रिय मानते हो, उन्हें धन, सम्मान, अर्घ्य, सत्कार तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके भोगोंद्वारा संतुष्ट करो, जिससे वे तुम्हारे प्रियजन धन और सुखके भागी हों ।। ९६ || अभिन्नवृत्ता विद्वांस: सदवत्ताश्चरितव्रता: । नत्वां नित्यार्थिनो जहारक्षुद्रा: सत्यवादिन:,जिनका सदाचार नष्ट नहीं हुआ है, जो विद्वान, सदाचारी और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं; जिन्हें सदा तुमसे अभीष्ट वस्तुके लिये प्रार्थना करनेकी आवश्यकता पड़ती है तथा जो श्रेष्ठ और सत्यवादी हैं, वे कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ सकते
yān arthabhājo manyethās te te syuḥ sukhabhāginaḥ | abhinna-vṛttā vidvāṃsaḥ sadvattāś carita-vratāḥ | na tvāṃ nityārthino jahyuḥ akṣudrāḥ satyavādinaḥ ||
भीष्म म्हणाले—ज्यांना तू आपले प्रिय व आधारयोग्य मानतोस, त्यांना समृद्धी व सुखाचा भागी कर. धन, मान, अर्घ्य, सत्कार आणि विविध भोगांनी त्यांना तृप्त ठेव. ज्यांचा सदाचार अखंड आहे, जे विद्वान, सद्वृत्त व व्रतनिष्ठ आहेत—ते जरी नित्य गरजेमुळे सहाय्य मागत असले, तरी उदार व सत्यवादी असल्याने तुला कधी सोडणार नाहीत।
भीष्म उवाच