ऋत्विग्धर्मः, दक्षिणा-न्यायः, तपसः परमार्थः
Ritvij-Dharma, the Norm of Dakṣiṇā, and the Higher Meaning of Tapas
अहिंसको ज्ञानतृप्त: स ब्रह्मासनमर्हति । एते महर्त्विजस्तात सर्वे मान्या यथाहत:,इसी तरह जो बुद्धिमान, सत्यको धारण करने-वाला, इन्द्रिय संयमी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला तथा राग-द्वेष आदि दोषोंसे दूर रहनेवाला है, जिसके शास्त्रज्ञान, सदाचार और कुल--ये तीनों अत्यन्त शुद्ध एवं निर्दोष हैं; जो अहिंसक और ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, वही ब्रह्मेके आसनपर बैठनेका अधिकारी है। तात! ये सभी महान् ऋत्विज् यथायोग्य सम्मानके पात्र हैं
ahiṃsako jñānatṛptaḥ sa brahmāsanam arhati | ete mahartvijaḥ tāta sarve mānyā yathāhataḥ ||
भीष्म म्हणाले—जो अहिंसक आहे आणि सत्य ज्ञानाने तृप्त आहे, तो ब्रह्मासनास योग्य आहे. तात! हे सर्व महान ऋत्विज आपल्या आपल्या यथोचित मानास पात्र आहेत.
भीष्म उवाच