Āśrama-dharma: Duties of the Four Life-Stages (आश्रमधर्मः)
प्याज बछ। जज: > शत्रुपर चढ़ाई करनेके चार अवसर ये हैं--(१) अपने मित्रोंकी वृद्धि। (२) अपने कोशका भरपूर संग्रह। (३) शत्रुके मित्रोंका नाश। (४) शत्रुके कोशकी हानि। > पहला शत्रु राजा, दूसरा मित्र राजा, तीसरा शत्रुका मित्र राजा, चौथा मित्रका मित्र राजा, पाँचवाँ शत्रुके मित्रका मित्र राजा, छठा अपने पृष्ठभागकी रक्षाके लिये स्वयं उपस्थित हुआ राजा, सातवाँ शत्रुकी सहायता एवं पृष्ठपोषणके लिये स्वयं उपस्थित राजा, आठवाँ अपने पक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, नवाँ शत्रुपक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, दसवाँ स्वयं विजयाभिलाषी नरेश, ग्यारहवाँ अपने और शत्रु दोनोंकी ओरसे मध्यस्थ राजा, बारहवाँ सबसे अधिक शक्तिशाली एवं उदासीन राजा--ये द्वादश राजमण्डल कहे गये हैं। ३-विष्णु, २-विरजा, ३-कीर्तिमान्, ४-कर्दम, ५-अनड्र, ६-अतिबल, ७-वेन, ८-पृथु। इस प्रकार गणना करनेपर राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें ज्ञात होते हैं। षष्टितमो< ध्याय: वर्ण-धर्मका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततः पुनः स गाड़ेयमभिवाद्य पितामहम् । प्राउ्जलिरनियतो भूत्वा पर्यपूच्छद् युधिछिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मनको वशमें करके गड़ानन्दन पितामह भीष्मको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पूछा--
vaiśampāyana uvāca | tataḥ punaḥ sa gāṅgeyam abhivādya pitāmaham | prāñjalir aniyato bhūtvā paryapṛcchad yudhiṣṭhiraḥ ||
वैशम्पायन म्हणाले—त्यानंतर धर्मराज युधिष्ठिराने पुन्हा गंगापुत्र पितामह भीष्मांना प्रणाम केला. हात जोडून, मन संयमित ठेवून, विनयाने त्याने प्रश्न विचारला।
वैशम्पायन उवाच
The verse frames ethical inquiry as requiring humility and self-control: Yudhiṣṭhira approaches the elder teacher Bhīṣma with reverence (prāñjali) and mental discipline (aniyata), establishing the proper attitude for receiving instruction on dharma.
In the Śānti Parva’s instructional setting, Yudhiṣṭhira again salutes Bhīṣma lying as the revered grandsire and, with composed mind and folded hands, begins a new question—continuing the extended dialogue on righteous conduct and governance.