Kṛṣṇa’s Dhyāna and the Prompt to Question Bhīṣma (कृष्णध्यानं भीष्मप्रश्नप्रेरणा च)
भगवन्! देवदेव! जैसे वायुशून्य स्थानमें रखे हुए दीपककी लौ काँपती नहीं, एकतार जलती रहती है, उसी तरह आप भी स्थिर हैं मानो पाषाणकी मूर्ति हों ।। यदि श्रोतुमिहाहामि न रहस्यं च ते यदि । छिन्धि मे संशयं देव प्रपन्नायाभियाचते,देव! यदि मैं सुननेका अधिकारी होऊँ और यदि यह आपका कोई गोपनीय रहस्य न हो तो मेरे इस संशयका निवारण कीजिये; इसके लिये मैं आपकी शरणमें आकर बारंबार याचना करता हूँ
yudhiṣṭhira uvāca |
bhagavan devadeva yathā vāyuśūnye sthāne sthāpitasya dīpasya śikhā na kampate ekatārā jvalaty eva, tathā tvam api sthiraḥ, pāṣāṇamūrti iva |
yadi śrotum ihāham arhāmi na rahasyaṃ ca te yadi |
chindhi me saṃśayaṃ deva prapannāya abhiyācate ||
भगवन्, देवदेव! वाऱ्याविना ठिकाणी ठेवलेल्या दीपाची ज्योत न थरथरता एकसारखी जळते, तसाच तू पाषाणमूर्तीसारखा स्थिर आहेस. देव! मी येथे ऐकण्यास पात्र असेन आणि हे तुझे गुप्त रहस्य नसेल, तर माझा संशय छेद; शरणागत होऊन मी तुला वारंवार विनवितो.
युधिछिर उवाच