अश्वशिरो-आख्यानम्
Aśvaśiras / Hayaśiras Narrative: Retrieval of the Vedas
ऋते देवप्रसादाद् वा राजन् ज्ञानागमेन वा | गहनं होतदाख्यानं व्याख्यातव्यं तवारिहन्,भीष्मजीने कहा--निष्पाप युधिष्ठिर! तुम प्रश्न करना खूब जानते हो। इस समय तुमने मुझसे बड़ा गूढ़ प्रश्न किया है। राजन! भगवान्की कृपा अथवा ज्ञानप्रधान शास्त्रके बिना केवल तर्कके द्वारा सैकड़ों वर्षो्में भी इन प्रश्नोंका उत्तर नहीं दिया जा सकता। शत्रुसूदन! यद्यपि यह विषय समझनेमें बहुत कठिन है, तो भी तुम्हारे लिये तो इसकी व्याख्या करनी ही है
ṛte devaprasādād vā rājan jñānāgamena vā | gahanaṃ hy etad ākhyānaṃ vyākhyātavyaṃ tavārihan ||
हे राजन्! देवकृपा किंवा ज्ञानप्रधान शास्त्रांचे मार्गदर्शन यांशिवाय हा गहन विषय केवळ तर्काने—शेकडो वर्षे झाली तरी—समजावता येत नाही. हे शत्रुसूदन! विषय अत्यंत दुर्गम असला तरी तुझ्यासाठी मला त्याचे निरूपण करावेच लागेल।
भीष्म उवाच