अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् । होनहार होकर ही रहती है; इसलिये व्यासजी घृताचीके रूपसे आकृष्ट हो गये। अग्नि प्रकट करनेकी इच्छासे अपने कामवेगको यत्नपूर्वक रोकते हुए महर्षि व्यासका वीर्य सहसा उस अरणीकाष्ठ पर ही गिर पड़ा ।। सो<5विशंकेन मनसा तथैव द्विजसत्तम:
तेव्हा त्याचे वीर्य सहसा त्याच अरणीकाष्ठावर पडले; तरीही द्विजश्रेष्ठ व्यास निःशंक मनाने त्याच कर्मात तत्पर राहिले।
भीष्म उवाच