Śuka–Janaka Saṃvāda: Āśrama-krama, Jñāna-vijñāna, and the Marks of Liberation (शुक-जनक संवादः)
अकार्पण्यमसंरम्भ: क्षमा धृतिरहिंसता । समता सत्यमानृण्यं मार्दवं हवीरचापलम्,धैर्य, आनन्द, प्रीति, उत्कर्ष, प्रकाश (ज्ञानशक्ति), सुख, शुद्धि, आरोग्य, संतोष, श्रद्धा, अकार्पण्य (दीनताका अभाव), असंरम्भ (क्रोधका अभाव), क्षमा, धृति, अहिंसा, समता, सत्य, ऋणसे रहित होना, मृदुता, लज्जा, अचंचलता, शौच, सरलता, सदाचार, अलोलुपता, हृदयमें सम्भ्रमका न होना, इष्ट और अनिष्टके वियोगका बखान न करना, दानके द्वारा धैर्य धारण करना, किसी वस्तुकी इच्छा न करना, परोपकार और सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया--ये सब सत्त्वसम्बन्धी गुण बताये गये हैं
Yājñavalkya uvāca: akāṛpaṇyam asaṃrambhaḥ kṣamā dhṛtir ahiṃsatā | samatā satyam ānṛṇyaṃ mārdavaṃ hrīr acāpalam ||
याज्ञवल्क्य म्हणाले—अकार्पण्य, असंरम्भ, क्षमा, धृति आणि अहिंसा; समता, सत्य, ऋणमुक्तता, मार्दव, लज्जा आणि अचंचलता—हे सत्त्वजन्य गुण सांगितले आहेत.
याज़्वल्क्य उवाच