Adhyātma–Adhibhūta–Adhidaivata Correspondences and the Triguṇa Lakṣaṇas (Śānti-parva 301)
श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते । शुक्रशोणितसंघाते मज्जास्नायुपरिग्रहे,प्राणियोंको विचित्र-विचित्र योनियोंमें अशुभ जन्म धारण करने पड़ते हैं। रक्त और मूत्रके पात्ररूप अपवित्र गर्भाशयमें निवास करना पड़ता है, जहाँ कफ, मूत्र और मल भरा होता है तथा तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त रहती है, जो रज और वीर्यका समुदायमात्र है, मज्जा एवं स््नायुका संग्रह है, सैकड़ों नस-नाड़ियोंमें व्याप्त है तथा जिसमें नौ द्वार हैं; उस अपवित्र पुर अर्थात् शरीरमें जीवको रहना पड़ता है। नरेश्वर! इन सब बातोंको जानकर अपने परम हितस्वरूप आत्माको और उसकी प्राप्तिके लिये शास्त्रोंद्वारा बताये हुए नाना प्रकारके योगों (साधनों) की जानकारी प्राप्त करनी चाहिये
śleṣma-mūtra-purīṣe ca tīvra-gandha-samanvite | śukra-śoṇita-saṅghāte majjā-snāyu-parigrahe ||
भीष्म म्हणाले—हा देह कफ, मूत्र व मलाने भरलेला, तीव्र दुर्गंधीयुक्त; केवळ शुक्र-शोणिताच्या संघाताने बनलेला आणि मज्जा व स्नायूंनी बांधलेला अपवित्र पात्र आहे—यातच जीवाला राहावे लागते। हे जाणून मनुष्याने परम हितरूप आत्मा ओळखावा आणि तिच्या प्राप्तीसाठी शास्त्रोक्त योगसाधने शिकावीत।
भीष्म उवाच
The verse cultivates dispassion (vairāgya) by emphasizing the body’s impure, composite nature, urging the seeker to turn toward ātma-jñāna (knowledge of the Self) and śāstra-taught yogic disciplines as the true means to the highest good.
In Śānti Parva, Bhīṣma instructs Yudhiṣṭhira on dharma and liberation-oriented wisdom. Here he describes the foul constituents of embodied existence to redirect the king’s attention from worldly attachment to spiritual practice and Self-realization.