जनक–पराशर संवादः — वर्ण-गोत्र-धर्मविचारः
Janaka–Parāśara: Varṇa, Gotra, and Dharma Inquiry
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान् परिवर्तते,कभी (तमोगुणकी अधिकतासे मोहाच्छन्न होनेपर) उसका न सुखसे संयोग होता है न दुःखसे (वह निद्रा और आलस्य आदिमें मग्न रहती है)। इस प्रकार यह भावात्मिका बुद्धि इन तीन भावोंका अनुसरण करती है
ती कधीही ना सुखात राहते, ना दुःखात. ही भावात्मिका बुद्धी या तीन भावांमध्ये (गुणांमध्ये)च फिरत राहते.
भीष्म उवाच