Adhyāya 270 — Yudhiṣṭhira’s inquiry on saṃnyāsa; Bhīṣma on calculable time, tamas, and karma
Vṛtra–Uśanā exemplum begins
कुण्डधार उवाच नाहं धनानि याचामि ब्राह्म॒णाय धनप्रद,कुण्डधार बोला--धनदाता देव! मैं ब्राह्मणके लिये धनकी याचना नहीं करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे इस भक्तपर किसी और प्रकारका ही अनुग्रह किया जाय। मैं अपने इस भक्तको रत्नोंसे भरी हुई पृथ्वी अथवा रत्नोंका विशाल भण्डार नहीं देना चाहता। मेरी तो यह इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो। इसकी बुद्धि धर्ममें लगी रहे तथा यह धर्मसे ही जीवन- निर्वाह करे। इसके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता रहे। इसीको मैं इसके लिये महान् अनुग्रह मानता हूँ
kuṇḍadhāra uvāca | nāhaṃ dhanāni yācāmi brāhmaṇāya dhanaprada | na ca ratnapṛthivīṃ tasmai dātuṃ vā ratnasañcayam | mama tv eṣā matiḥ śreṣṭhā yathā dharmātmā bhavet | dharme buddhir asya satataṃ dharmeṇaiva ca jīvikā | dharmapradhānaṃ jīvitaṃ tad asmai paramānugraham ||
कुण्डधार म्हणाला—हे धनदाता देव! मी या ब्राह्मणासाठी धन मागत नाही. मला या भक्तावर वेगळ्याच प्रकारचा अनुग्रह व्हावा असे वाटते.
कुण्डधार उवाच