कामद्रुम-रूपकः तथा शरीर-पुर-रूपकः
The Desire-Tree and the Body-as-City Metaphors
तत् तेरहं सम्प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि,बेटा! तुम मुझसे जो प्रश्न कर रहे हो, उसके अनुसार मैं इससे भी गूढ़तर अर्थवाले अलौकिक अध्यात्मज्ञानका उपदेश करूँगा, जिसे महर्षियोंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है और जिसका वेदान्तशास्त्र--उपनिषदोंमें गान किया गया है यत् तु सम्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् | अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधार्यताम् जब मोहसयुक्त भाव मनपर छा जाय, किसी भी विषयमें कोई बात स्पष्ट न जान पड़े, जब तर्क भी काम न दे और किसी तरह कोई बात समझमें न आवे, तब समझना चाहिये कि तमोगुण प्रवृत्त हुआ है
tad etad ahaṃ sampravakṣyāmi yan māṃ tvaṃ paripṛcchasi | yat tu sammohasaṃyuktam avyaktaviṣayaṃ bhavet | apratarkyam avijñeyaṃ tamas tad upadhāryatām ||
व्यास म्हणाले—पुत्रा! तू मला जे विचारतोस ते आता मी सांगतो. जेव्हा मोहयुक्त अशी अवस्था येते की विषय अस्पष्ट होतो, तर्क तेथे पोहोचत नाही आणि ते स्पष्टपणे कळत नाही—तेव्हा समजावे की तमोगुण प्रवृत्त झाला आहे.
व्यास उवाच