Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
धर्मोपस्थो हवीवरूथ उपायापायकूबर: । अपानाक्ष: प्राणयुग: प्रज्ञायुर्जीवबन्धन:,यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त तपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रिययमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
vyāsa uvāca | dharmopastho havīvarūtha upāyāpāyakūbaraḥ | apānākṣaḥ prāṇayugaḥ prajñāyur jīvabandhanaḥ ||
व्यास म्हणाले—हा योग एक सुंदर रथ आहे. धर्म त्याचे आसन, लज्जा त्याचे आवरण. योग्य उपाय आणि अयोग्याचा परिहार हे त्याचे कूबर. अपान त्याची धुरा, प्राण त्याचे जू. प्रज्ञा त्याचे आयुष्य, आणि देहधारी जीवन ही त्याची बंधन-रज्जू आहे.
व्यास उवाच
Yoga is presented as an integrated ethical-spiritual vehicle: dharma and disciplined method support the practitioner, while mastery of the vital breaths and the cultivation of wisdom sustain progress toward the highest end.
Vyāsa uses an extended chariot allegory to describe the inner equipment of a yogin—ethical foundations, disciplined means, regulated life-breaths, and wisdom—by which the embodied self can travel the contemplative path toward liberation.