योग–सांख्यसमन्वयः, रथोपमा, व्यक्त–अव्यक्तविवेकः
Yoga–Sāṃkhya Synthesis, Chariot Allegory, and the Vyakta–Avyakta Distinction
नैके5श्रन्ति सुसम्पन्नं न गच्छन्ति परस्त्रियम् । सर्वभूतेष्ववर्तन्त यथा55त्मनि दयां प्रति,वे अकेले बढ़िया भोजन नहीं करते थे। पहले दूसरोंको देकर पीछे अपने उपभोगमें लाते थे। परायी स्त्रीसे कभी संसर्ग नहीं रखते थे। सब प्राणियोंको अपने ही समान समझकर उनपर दया रखते थे
शक्र म्हणाला—ते एकटेच समृद्ध भोजन करीत नसत; आधी इतरांना देऊन मग स्वतः ग्रहण करीत. परस्त्रीकडे कधी जात नसत. सर्व प्राण्यांत स्वतःसमान भाव ठेवून दयेचे आचरण करीत.
शक्र उवाच