निर्मयदि महायुद्धे वर्तमाने सुदारुणे । प्रादुरासन् विनाशाय तदोत्पाता: सुदारुणा:,माननीय नरेश! जब सब ओरसे वह मर्यादाशून्य युद्ध होने लगा, आपके और शत्रुपक्षके योद्धा मारे जाने लगे, युद्धपरायण वीरोंकी गर्जना और श्रेष्ठ शंखोंकी ध्वनि होने लगी, धनुर्धरोंकी ललकार, सिंहनाद और गर्जनाओंके साथ जब वह युद्ध औचित्यकी सीमाको पार कर गया, योद्धाओंके मर्मस्थल विदीर्ण किये जाने लगे, विजयाभिलाषी योद्धा इधर-उधर दौड़ने लगे, रणभूमिमें सब ओर शोकजनक संहार होने लगा, बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंके सीमन्तके सिन्दूर मिटाये जाने लगे तथा सारी मर्यादाओंको तोड़कर अत्यन्त भयंकर महायुद्ध चलने लगा, उस समय विनाशकी सूचना देनेवाले अति दारुण उत्पात प्रकट होने लगे
nirmaryāde mahāyuddhe vartamāne sudāruṇe | prādurāsan vināśāya tadotpātāḥ sudāruṇāḥ ||
संजय म्हणाला—महाराज! जेव्हा सर्व मर्यादा मोडून महायुद्ध अत्यंत दारुण रीतीने पेटले, तेव्हा विनाशाची सूचना देणारे अतिभयंकर उत्पात प्रकट होऊ लागले.
संजय उवाच
When warfare loses maryādā (ethical restraint and limits), it becomes self-destructive; the epic frames such moral collapse as accompanied by ominous signs, underscoring that adharma in action ripens into ruin.
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that as the battle turns utterly dreadful and unrestrained, terrifying portents arise—signals that the conflict is moving toward catastrophic destruction.