Sauptika Parva, Adhyaya 8 — Dhṛṣṭadyumna-vadha and the Camp’s Nocturnal Rout
कालीं रक्तास्यनयनां रक्तमाल्यानुलेपनाम् | रक्ताम्बरधरामेकां पाशहस्तां कुटुम्बिनीम्,उस समय पाण्डवपक्षके योद्धाओंने मूर्तिमती कालरात्रिको देखा, जिसके शरीरका रंग काला था, मुख और नेत्र लाल थे। वह लाल फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये हुए थी। उसने लाल रंगकी ही साड़ी पहन रखी थी। वह अपने ढंगकी अकेली थी और हाथमें पाश लिये हुए थी। उसकी सखियोंका समुदाय भी उसके साथ था। वह गीत गाती हुई खड़ी थी और भयंकर पाशोंद्वारा मनुष्यों, घोड़ों एवं हाथियोंको बाँधकर लिये जाती थी
kālīṁ raktāsyanayanāṁ raktamālyānulepanām | raktāmbaradharām ekāṁ pāśahastāṁ kuṭumbinīm ||
त्या वेळी पाण्डवपक्षाच्या योद्ध्यांनी मूर्तिमती कालरात्रि पाहिली—देह काळा, पण मुख व नेत्र रक्तवर्ण. रक्तफुलांची माळ, रक्तचंदनाचा लेप आणि रक्तवस्त्रे धारण केलेली. ती एकटीच, विलक्षण, हातात पाश घेऊन, आपल्या सख्यांच्या समुदायाने वेढलेली होती. ती गीत गात उभी होती आणि भयंकर पाशांनी मनुष्य, घोडे व हत्ती यांना बांधून घेऊन जात होती.
संजय उवाच