Jarā’s Account and the Enthronement of Jarāsandha (जरासंधोत्पत्तिः अभिषेकश्च)
(बृहद्रथं च स ऋषि: यथावत् प्रत्यनन्दत । उपविष्टश्न॒ तेनाथ अनुज्ञातो महात्मना ।। तमपृच्छत् तदा विप्र: किमागमनमित्यथ । पौरैरनुगतस्यैव पत्नीभ्यां सहितस्य च ।। महर्षिने भी यथोचित बर्तावद्वारा बृहद्रथको प्रसन्न किया। उन महात्माकी आज्ञा पाकर राजा उनके निकट बैठे। उस समय ब्रह्मर्षि चण्डकौशिकने उनसे पूछा--“राजन्! अपनी दोनों पत्नियों और पुरवासियोंके साथ यहाँ तुम्हारा आगमन किस उद्देश्यसे हुआ है?/। स उवाच मुनि राजा भगवन् नास्ति मे सुतः । अपुत्रस्थ वृथा जन्म इत्याहुर्मुनिसत्तम ।। तब राजाने मुनिसे कहा--“भगवन्! मेरे कोई पुत्र नहीं है। मुनिश्रेष्ठ! लोग कहते हैं कि पुत्रहीन मनुष्यका जन्म व्यर्थ है। तादृशस्य हि राज्येन वृद्धत्वे कि प्रयोजनम् । सो<हं तपश्चरिष्यामि पत्नीभ्यां सहितो वने ।। “इस बुढ़ापेमें पुत्रहीन रहकर मुझे राज्यसे क्या प्रयोजन है? इसलिये अब मैं दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें रहकर तपस्या करूँगा। नाप्रजस्य मुने कीर्ति: स्वर्गश्नैवाक्षयो भवेत् । एवमुक्तस्य राज्ञा तु मुने: कारुण्यमागतम् ।।) “मुने! संतानहीन मनुष्यको न तो इस लोकमें कीर्ति प्राप्त होती है और न परलोकमें अक्षय स्वर्ग ही प्राप्त होता है।' राजाके ऐसा कहनेपर महर्षिको दया आ गयी। तमब्रवीत् सत्यधृति: सत्यवागृषिसत्तम: । परितुष्टोस्मि राजेन्द्र वरं वरय सुव्रत,तब धैर्यसे सम्पन्न और सत्यवादी मुनिवर चण्डकौशिकने राजा बृहद्रथसे कहा--“उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो।' यह सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों रानियोंके साथ मुनिके चरणोंमें पड़ गये और पुत्रदर्शनसे निराश होनेके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गदगद वाणीमें बोले
sa uvāca munir rājā bhagavan nāsti me sutaḥ | aputrasya vṛthā janma ity āhur munisattama ||
राजा मुनिंना म्हणाला—“भगवन्! मला पुत्र नाही. मुनिश्रेष्ठ! लोक म्हणतात की अपत्याविना मनुष्याचा जन्म व्यर्थ असतो.”
स उवाच मुनि राजा भगवन् नास्ति मे सुतः ।
The verse reflects a traditional dharmic view that household life and social duty are tied to continuity—offspring, succession, and remembrance. It also sets up an ethical tension: when worldly roles feel purposeless (here, kingship without an heir), one may turn toward tapas (austerity) and seek higher guidance.
After being received by the sage, the king explains the reason for his visit: he has no son and feels his life is therefore futile. This confession becomes the immediate cause for the sage’s compassion and the subsequent offer of a boon.