उत्पातदर्शनम् — Portents and Kāla among the Vṛṣṇis
एष गच्छामि पदवीं सत्येन च तथा शपे । सौप्तिके ये च निहता: सुप्ता येन दुरात्मना,तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकि उठे और इस प्रकार बोले--'सुमध्यमे! यह देखो, मैं द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंके, धृष्टद्यम्मके और शिखण्डीके मार्गपर चलता हूँ, अर्थात् उनके मारनेका बदला लेता हूँ और सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि जिस पापी दुरात्मा कृतवमनि द्रोणपुत्रका सहायक बनकर रातमें सोते समय उन वीरोंका वध किया था आज उसकी भी आयु और यशका अन्त हो गया”
eṣa gacchāmi padavīṃ satyena ca tathā śape | sauptike ye ca nihatāḥ suptā yena durātmanā ||
‘मी त्याच पायवाटेने जातो; सत्याची शपथ घेऊन सांगतो— सौप्तिक हल्ल्यात जे मारले गेले, ज्यांना त्या दुरात्म्याने झोपेत असताना ठार केले।’
वैशम्पायन उवाच