वह शत्रुके मर्मस्थलको छेदनेमें समर्थ, रक्त और मांससे लिप्त होनेवाला, अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी, बहुमूल्य, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाला, मूठी बँधे हुए हाथसे तीन हाथ बड़ा, छः पंखोंसे युक्त, शीघ्रगामी, भयंकर वेगशाली, इन्द्रके वज्रके तुल्य पराक्रम प्रकट करनेवाला, मुँह बाये हुए कालाग्निके समान अत्यन्त भयानक, भगवान् शिवके पिनाक और नारायणके चक्र-सदृश भयदायक तथा प्राणियोंका विनाश करनेवाला था।। जग्राह पार्थ: स शरं प्रह्ृष्टो यो देवसड्घैरपि दुर्निवार्य: । सम्पूजितो य: सततं महात्मा देवासुरान् यो विजयेन्महेषु:,देवताओंके समुदाय भी जिनकी गतिको अनायास नहीं रोक सकते, जो सदा सबके द्वारा सम्मानित, महामनस्वी, विशाल बाण धारण करनेवाले और देवताओं तथा असुरोंपर भी विजय पानेमें समर्थ हैं उन कुन्तीकुमार अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको हाथमें लिया
jagrāha pārthaḥ sa śaraṃ prahṛṣṭo yo devasaṅghair api durnivāryaḥ | sampūjito yaḥ satataṃ mahātmā devāsurān yo vijayen maheṣuḥ ||
संजय म्हणाला—हर्षित झालेला पार्थ (अर्जुन) तो बाण हातात घेऊन उभा राहिला; ज्याची गती देवसमूहांनाही सहज रोखता येत नव्हती. सर्वांनी सदैव पूजिलेला, महात्मा व रणात पराक्रमी अर्जुन देव-दानवांवरही विजय मिळविण्यास समर्थ होता; म्हणून युद्धधर्माच्या कठोर मर्यादेत, संयमित संकल्प न सोडता, त्याने तो निर्णायक सामर्थ्याचा अस्त्र स्वीकारला.
संजय उवाच
The verse highlights disciplined martial readiness: a righteous warrior accepts a powerful means when duty demands decisive action, yet the emphasis remains on controlled purpose (restraint, honor, and responsibility) rather than mere violence.
Sañjaya describes Arjuna joyfully taking up a formidable arrow—so potent that even the gods could hardly obstruct it—underscoring Arjuna’s stature as a revered, great-souled, and supremely capable archer in the climactic battles of the Karṇa Parva.