प्रजानाथ! कर्णके शरीरमें बहुत-से बाण धँस गये थे। उनके द्वारा समरांगणमें उसकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे वृक्षोंसे व्याप्त शिखर और कन्दरावाले गिरिराजके ऊपर लाल कनेरके फूल खिलनेसे उसकी शोभा होती है ।। स बाणसड्घान् बहुधा व्यवासृजद् विभाति कर्ण: शरजालरश्मिवान् | सलोहितो रक्तगभस्तिमण्डलो दिवाकरो<स्ताभिमुखो यथा तथा
sa bāṇasaṅghān bahudhā vyavāsṛjad vibhāti karṇaḥ śarajālaraśmivān | sa-lohito raktagabhastimaṇḍalo divākaro ’stâbhimukho yathā tathā ||
कर्णाच्या देहात अनेक बाण रुतले होते, तरी तो रणांगणात शोभून दिसत होता. तो पुन्हा पुन्हा बाणांचे समूह सोडीत असा भासत होता, जसा अस्ताचलाभिमुख रक्तवर्ण मण्डल व रक्त किरणांनी युक्त सूर्य।
संजय उवाच