अध्याय ९ — कर्णस्य प्रहारः, योधयुग्मनियोजनम्, शैनेय-कैकेययोर्युद्धविन्यासः
मोहयित्वा रणे पार्थान् वजहस्त इवासुरान् । स कथं निहत: शेते वायुरुग्ण इव द्रुम:,युधिष्ठिरकी सेना तथा पांचाल रथियोंके समुदायका संहार करके जिस महारथी वीरने अपने बाणोंकी वर्षसे सम्पूर्ण दिशाओंको संतप्त कर दिया और वज्धारी इन्द्र जैसे असुरोंको अचेत कर देते हैं, उसी प्रकार जिसने रणभूमिमें कुन्तीकुमारोंको मोहमें डाल दिया था, वही किस तरह मारा जाकर आँधीके उखाड़े हुए वृक्षके समान धरतीपर पड़ा है?
dhṛtarāṣṭra uvāca | mohayi tvā raṇe pārthān vajrahasta ivāsurān | sa kathaṁ nihataḥ śete vāyurugṇa iva drumaḥ ||
धृतराष्ट्र म्हणाले— रणात पृथापुत्रांना वज्रधारी इंद्र जसा असुरांना मोहात टाकतो तसा मोहवून टाकणारा तो वीर कसा काय मारला जाऊन वादळाने उपटलेल्या वृक्षासारखा भूमीवर पडला आहे?
धृतराष्ट उवाच