अध्याय ९ — कर्णस्य प्रहारः, योधयुग्मनियोजनम्, शैनेय-कैकेययोर्युद्धविन्यासः
दुर्योधनो नाभ्यगृह्नान्मूढ: पथ्यमिवौषधम् | युधिष्ठिर सदा यही कहते रहे कि “युद्ध न करो।” परंतु मूर्ख दुर्योधनने हितकारक औषधके समान उनके उस वचनको ग्रहण नहीं किया
dhṛtarāṣṭra uvāca | duryodhano nābhyagṛhṇān mūḍhaḥ pathyam ivauṣadham |
मूढ दुर्योधनाने युधिष्ठिरांचा “युद्ध करू नका” हा हितकर उपदेश पथ्य औषधाप्रमाणेही स्वीकारला नाही; जसा अज्ञ मनुष्य लाभदायक औषध नाकारतो.
धृतराष्ट उवाच