अपतिह्ठ[सि कृष्णेति सूतपुत्रो यदब्रवीत् धृतराष्ट्रमते कर्ण: श्लाघमान: स्वकान् गुणान्,'सूतपुत्र कर्णने धृतराष्ट्रके मतमें होकर अपने गुणोंकी प्रशंसा करते हुए जो द्रौपदीसे यह कहा था कि “कृष्णे! तू पतिहीन है” उसके इस कथनको मेरे तीखे बाण असत्य कर दिखायेंगे और क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पोके समान उसके रक्तका पान करेंगे
apatihīṭhāsi kṛṣṇeti sūtaputro yad abravīt dhṛtarāṣṭramate karṇaḥ ślāghamānaḥ svakān guṇān | tasya tad vacanaṃ me tīkṣṇāḥ śarā asatyaṃ kariṣyanti krodhapūrṇā viṣadharā iva sarpāḥ tasya raktapānaṃ kariṣyanti ||
“धृतराष्ट्राच्या पक्षात राहून, आपल्या गुणांची श्लाघा करत सूतपुत्र कर्ण द्रौपदीला जे म्हणाला होता—‘कृष्णे! तू पतिहीन आहेस’—”
संजय उवाच