तत्र सर्वत्र दुष्टात्मा कर्ण: पापमतिर्मुखम् । “दुर्योधनने तुमलोगोंके साथ जो-जो पापपूर्ण बर्ताव किया है, उन सबमें पापबुद्धि दुष्टात्मा कर्ण ही प्रधान कारण है ।। यच्च तद् धार्तराष्ट्रस्य क्रूरै: पड़भिर्महारथै:,'सखे! सुभद्राका वीरपुत्र अभिमन्यु साँड़के समान बड़े-बड़े नेत्रोंसे सुशोभित तथा कुरुकुल एवं वृष्णिवंशके यशको बढ़ानेवाला था। उसके कंधे साँड़के कंधोंके समान मांसल थे। वह द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि नरश्रेष्ठ वीरोंको पीड़ा दे रहा था। हाथियोंको महावतों और सवारोंसे, महारथियोंको रथोंसे, घोड़ोंको सवारोंसे तथा पैदल सैनिकोंको अस्त्र-शस्त्र एवं जीवनसे वंचित कर रहा था। सेनाओंका विध्वंस और महारथियोंको व्यथित करके वह मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको यमलोक भेज रहा था। बाणोंद्वारा शत्रुसेनाको दग्ध-सी करके आते हुए सुभद्राकुमारको जो दुर्योधनके छ: क्रूर महारथियोंने मार डाला और उस अवस्थामें मारे गये अभिमन्युको जो मैंने अपनी आँखोंसे देखा, वह सब मेरे अंगोंको दग्ध किये देता है। प्रभो! मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि उसमें भी दुष्टात्मा कर्णका ही द्रोह काम कर रहा था
sañjaya uvāca | tatra sarvatra duṣṭātmā karṇaḥ pāpamatir mukham |
संजय म्हणाला—त्या सर्व प्रसंगांत पापबुद्धी दुरात्मा कर्णच प्रमुख होता. धार्तराष्ट्रपुत्राकडून जे जे क्रूर व अधर्मकर्म घडले, त्यामागे कर्णाची द्रोहबुद्धीच मुख्य कारण होती.
संजय उवाच
Moral responsibility is traced to intention and instigation: Sañjaya identifies Karṇa as the chief driver of sinful, cruel actions, highlighting how evil counsel and will can become the primary cause behind collective wrongdoing.
Sañjaya, reporting to Dhṛtarāṣṭra, assigns principal blame to Karṇa for the Kauravas’ cruel and unrighteous conduct in the events being recounted, presenting Karṇa as the leading instigator among them.