Adhyāya 92: Irāvanta-śoka, punaḥ-pravṛttiḥ saṅgrāmasya
Arjuna’s grief and the battle’s renewed intensity
निज्द्रिश्न श्वसद्धिश्व कूजद्धिश्व गतासुभि: । हयैर्बभौ नरश्रेष्ठ नानारूपधरैर्धरा,राजन! वहाँ गिरते हुए घोड़ोंकी लाशोंसे सारी पृथ्वी पट गयी। किन्हींकी जीभ निकल आयी थी, कोई लंबी साँस खींच रहे थे, कोई धीरे-धीरे अव्यक्त शब्द करते और कितनोंके प्राण निकल गये थे। नरश्रेष्ठट इस प्रकार विभिन्न रूपधारी घोड़ोंसे आच्छादित होनेके कारण इस पृथ्वीकी अद्भुत शोभा हो रही थी
niśvasadbhir kūjadbhir gatāsubhiś ca hayair babhau naraśreṣṭha nānārūpadharair dharā | rājan |
संजय म्हणाला—हे राजन्, तेथे काही घोडे दीर्घ श्वास घेत होते, काही मंद अस्पष्ट आवाज काढत होते, आणि बरेचसे प्राणहीन झाले होते। हे नरश्रेष्ठ, नानारूपधारी घोड्यांनी आच्छादित झाल्यामुळे ती धरा एक विचित्र व भयाण शोभा धारण करीत होती।
संजय उवाच