अध्याय ८० — मध्यंदिन-रणवृत्तान्तः
Yudhiṣṭhira–Śrutāyu encounter; Cekitāna–Gautama clash; Abhimanyu pressure; Arjuna’s redeployment
न हि मे जीवितेनापि विद्यतेडद्य प्रयोजनम् । भीमसेन रणे हित्वा स्नेहमुत्सूज्य पाण्डवैः,'सारथे! युद्धस्थलमें भीमसेनको छोड़कर और पाण्डवोंसे स्नेह तोड़कर अब मेरे जीवनसे कोई प्रयोजन नहीं है
na hi me jīvitena api vidyate ’dya prayojanam | bhīmasena raṇe hitvā sneham utsṛjya pāṇḍavaiḥ |
सारथे! आज माझ्या जीवनाचाही काही उपयोग नाही, जर रणभूमीवर भीमसेनाला सोडून पांडवांशी असलेला स्नेह तोडावा लागला तर।
संजय उवाच