आत्मदोष-उपदेशः तथा भीम-धृष्टद्युम्नयोः संयोगः
Self-Causation Counsel and the Bhīma–Dhṛṣṭadyumna Convergence
कवचोपहितैगत्रिहस्तैश्व समलंकृतैः । मुखैश्न चन्द्रसंकाशै रक्तान्तनयनै: शुभै:,भूपाल! दो ही घड़ीमें वहाँकी सारी वसुधा कवचसे ढके हुए शरीरों, आभूषणोंसे विभूषित हाथों, चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखों, जिनके अन्तभागमें कुछ-कुछ लाली थी, ऐसे सुन्दर नेत्रों तथा हाथी, घोड़े और मनुष्योंके सम्पूर्ण अंगोंसे बिछ गयी थी
sañjaya uvāca | kavacopahitair gātrair hastaiś ca samalaṅkṛtaiḥ | mukhaiś ca candrasaṅkāśai rakta-antananayaiḥ śubhaiḥ ||
संजय म्हणाला—हे भूपाल! थोड्याच वेळात तेथील सारी वसुंधरा कवचाने आच्छादित देहांनी, आभूषणांनी विभूषित हातांनी, चंद्रासारख्या सुंदर मुखांनी आणि कोपऱ्यांत लालसर छटा असलेल्या शुभ नेत्रांनी सर्वत्र पसरून गेली।
संजय उवाच