विभूति-योगः (Vibhūti-yoga) — Exemplary Manifestations as a Contemplative Index
सम्बन्ध--ब्रह्माकी यात्रिके आरम्भमें जिस अव्यक्तमें समस्त थूत लीन होते हैं और दिनका आरम्भ होते ही जिससे उत्पन्न होते हैं; वही अव्यक्त सर्वश्रेष्ठ है या उससे बढ़कर कोई दूसरा और है? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- परस्तस्मात्तु भावो<न्योडव्यक्तोडव्यक्तातू सनातन: । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति,उस अव्यक्तसे भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्तभाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता*
parastasmāt tu bhāvo 'nyo 'vyakto 'vyaktāt tu sanātanaḥ | yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati ||
परंतु त्या अव्यक्तापलीकडेही एक दुसरा, सनातन अव्यक्तभाव आहे; सर्व भूतांचे नाश झाले तरी तो परम पुरुष नाश पावत नाही।
अजुन उवाच