अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga
The Yoga of the Imperishable Brahman
सम्बन्ध--इस प्रकार भ्क्तियोगद्वाय भगवान्कों प्राप्त हुए पुरुषके महत्त्वका प्रतिपादन करके अब सांख्ययोगद्वारा परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके समदर्शनका और गहत्त्वका प्रतिपादन करते हैं-- आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योअर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मत:,हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता हैः और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśyati yo 'rjuna | sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ ||
हे अर्जुना! जो योगी आत्मौपम्याने सर्वत्र सर्व प्राण्यांत समदृष्टी ठेवतो, आणि सुख वा दुःख हेही सर्वांमध्ये समान मानतो—तो योगी परम श्रेष्ठ मानला जातो.
अर्जुन उवाच